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शनिवार, 17 मई 2014

Art आर्ट की ऑनलाइन मार्केटिंग


मूमल नेटवर्क, जयपुर। ऑनलाइन मार्केट के बढ़ते रूझान को देखते हुए अब आर्टिस्ट भी अपनी पेंटिंग्स को ऑनलाइन प्रमोट करने लगे हैं।
इनमें पेंटिंग्स से लेकर आर्ट डेकोरेटिव पीस भी शामिल हैं। आर्टवर्क के लिए इंडियन के साथ फॉरेन शॉपिंग वेबसाइट्स भी शामिल हो गई हैं।
ज्यादातर वेबसाइट्स कस्टमाइज्ड 
आर्टवर्क को प्रमोट करने वाली ज्यादातर वेबसाइट्स कस्टमाइज्ड हैं। इनसे सिर्फ  पेंटिंग्स ही खरीदी जा सकती हैं। वेबसाइट्स को इस तरह तैयार किया गया है कि उसमें हर एक पेंटिंग्स की डिजाइन से लेकर उसके प्रकार को विस्तार से बताया जाता है। दूसरी ओर, आर्टिस्ट भी आसानी से इसमें अपनी पेंटिंग को अपलोड कर सकते हैं।
एग्जीबिशन के लिए ऑनलाइन गैलरीज
इन वेबसाइट्स पर  सिर्फ पेंटिंग्स ही नहीं खरीदी जा सकती, बल्कि आर्टवर्क को देखा भी जा सकता है। ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स आर्टिस्ट को आर्ट गैलरीज भी मुहैया करवा रही हैं, जिनमें अनसोल्ड पेंटिंग भी डिस्प्ले की जाती हैं। देश के विभिन्न कोनों से अपलोड की गई पेंटिंग्स आर्टिस्ट के साथ आर्ट लवर्स को भी लुभाने लगी हैं।
पेंटिंग्स फॉर ओकेजन
खास बात यह है कि कस्टमाइज वेबसाइट पर डिफरेंट तरह की पेंटिंग्स के सेग्मेंट बने हुए हैं, जिन पर कॉरपोरेट आर्ट से लेकर होटल आर्टवर्क, सभी शामिल हैं। दूसरी ओर, यदि आप किसी को स्पेशल ओकेजन पर पेंटिंग गिफ्ट करना चाहते हैं, तो ओकेजन के मुताबिक पेंटिंग मिल जाएगी। यहां तक की फ्रे मिंग और गिफ्ट रैपिंग की सुविधा भी मिल जाएगी।
गुड फॉर आर्ट लवर्स 
कस्टमाइज ऑनलाइन शॉपिंग के अलावा ये पेंटिंग्स नामी शॉपिंग वेबसाइट्स से भी खरीदी जा सकती हैं। यह सुविधा उन आर्ट लवर्स और आर्टिस्ट के लिए फायदेमंद हो सकती है, जहां आर्ट गैलरीज की कमी है।
खरीद सकते हैं ऑनलाइन
सिर्फ पेंटिंग्स ही नहीं, यदि आप फोटोग्राफ्स भी पसंद करते हैं, तो उन्हें भी ऑनलाइन खरीद सकते हैं। देश में ?से फोटोग्राफी ग्रुप हैं, जो इस तरह की सुविधा देते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन फोटो सेल की कई ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स भी हैं। इनमें डिफरेंट प्लेसेज, वाइल्डलाइफ, फैशन, रूरल मार्केट, कॉन्सेप्ट शूट और रिमोट एरिया साइट्स सहित कई तरह की फोटो शामिल होती हंै। फोटोज का रिजोलूशन भी काफी हाई रहता है। इन साइट्स के जरिए आप फोटोग्राफी के बारे में जानकारी भी जुटा सकते हैं।

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

जहांगीर में बहरुपिए की प्रेमकथा


चित्रकार हितेन्द्र सिंह भाटी 
मूमल नेटवर्क, जयपुर। चित्रकार हितेन्द्र सिंह भाटी के नए चित्रों की श्रृंखला बहरुपिए की प्रेमकथा मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलेरी में 23 अक्टूबर से 29 अक्टूबर तक प्रदर्शित की जाएगी।
भाटी के अनुसार उन्होंने इस बार बहरुपियों को अपने चित्रों का विषय बनाया है। भाटी का मानना है कि बहरुपिए ही वह खांटी कलाकार हैं जो भारत की इस पारम्परिक कला के लिए अपने तन और मन को कला का माध्यम बनाते हैं। उनका तन ही उनका कैनवास होता है और भाव उसमें रंग भरते हैें। ऐसे में यह खालिस बॉडी आर्ट कहा जा सकता है। भाटी ने उन्हें ही अपनी कृतियों में संजोया है।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

खुद में खोए कलाकारों का जमावड़ा, अगले महीने दिल्ली में...

  दिल्ली में अगले महीने आईफैक्स में आयोजन

मूमल नेटवर्क, नई दिल्ली। राजधानी की आईफैक्स आर्ट गैलेरी में नवम्बर माह में देश भरके अनुभवी चित्रकारों के साथ युवा कूची के तेवर भी देखने को मिलेंगे।
'पेन्ट फार जस्टिस' के नाम से होने वाले इस प्रदर्शन में मुख्यतया दो विचारों का दर्शन समेटने का प्रयास होगा। पहला ये कि कलाकार उन विषयों को अपनी कृतियों में उकेरे जिन से आम व्यक्ति मानसिक रूप से घायल हुआ है। दूसरा विचार यह है कि इस आयोजन के जरिए उन कलाकारों को मुख्य सामाजिक धारा में जोड़ा जाए जो अभी खुद में ही खोए हुए हैं।

इस आयोजन के लिए बड़े पैमाने पर व्यवसायिक व्यवस्थाएं की गई हैं, इसमें भाग लेने के लिए प्रत्येक कलाकार से 1100 रुपए शुल्क लिया गया है। इसके प्रचार-प्रसार के लिए पेशेवर लोगों की सेवाएं ली गई हैं, यह बात अलग है कि देशभर में वरिष्ठ कलाकारों के विभिन्न गुटों ने इस आयोजन को दरकिनार किया है।

इस आयोजन में प्रत्येक राज्य से ग्यारह-ग्यारह कलाकारों के दल भाग लेंगे। इन कलाकारों के दल मेंं एक सीनियर आर्टिस्ट उनका कन्वीनर होगा। राजस्थान से जाने-माने चित्रकार और कला शिक्षक डा. अनुपम भटनागर के प्रतिनिधित्व में जो दल इस प्रदर्शन में भाग लेगा उसमें जयपुर से रमेश शर्मा, जोधपुर से प्रदिप्तों दास, अजमेर से रूपाली माथुर, कोटा से डा. सुरेश प्रजापति, कुचामन सिटी से गिरीश, भीलवाड़ा से अनिल मोहनपुरिया, एस.एन. सोनी, निशा कानावत व सौरव भट्ट, उदयपुर से डा. मोहनलाल जाट, व बांसवाड़ा से स्वयं डा. अनुपम भटनागर शामिल हैं।
पेंन्ट फार जस्टिस के लिए राजस्थान से डा. अनुपम भटनागर की नई कृति 'ओह! मेरा बचपन'  इसे केनवास पर एक्रेलिक रंगों से सजाया गया है। इसका आकार है 24 गुणा 30 इंच।  कृति पर कलाकार ने कविता भी लिखी है।
  कविता
ओह! मेरा बचपन
कोई है?
जो दिलाए मुक्ति;
बैग के बोझ से
और
लौटा दे मेरा बचपन
ए बी सी और वन टू थ्री ने
खो दिया जिसे...
बैग, बोतल, टिफिन का
कंधे तोड़ता बोझ
सभी ने किया बदरंग
बचपन का रंग...
नानी की कहानियां
आइस-पाइस, छुप्पा-छुप्पी
लंगड़ी-टांग, पकड़म-पकड़ाई
सब... वो-मारा वो-काटा
मेरी गुडिय़ा
उसकी शादी
खेल मेरे बचपन के
बस रस्में निभाई...
सबका गौना सबकी विदाई
फिर एक दिन दब गया
बैग तले बचपन
ओह! मेरा बचपन
झूल रहा है बैग में...
डा अनुपम भटनागर द्वारा अपनी कृति पर लिखी पहली कविता 

रविवार, 22 जनवरी 2012

छोटे शहरों में बन रही है कला बाजार की नई टेरेटरी

जयपुर के कई आर्ट कलेक्टर बताते हैं कि उनके पास दिल्ली, हैदराबाद, सूरत, भोपाल, लखनऊ और गया जैसे शहरों से लोगों के फोन आते हैं। वे यहां के आर्ट और आर्टिस्टों के बारे में जानना चाहते हैं। वे यहां के कलेक्शंस को खरीदने में रुचि दिखाते हैं। उनके पास पैसा तो है लेकिन यहां के आर्ट और आर्टिस्टों तक पहुंच नहीं है।
वैसे तो भारतीय कला बाजार को मॉनिटर करने का कोई ठोस तंत्र विकसित नहीं हो पाया है, फिर भी एक्सपट्र्स की मानें, तो यह लगभग एक हजार करोड़ से सोलह सौ करोड़ के बीच होगा। पिछले दस सालों में उसमें तेजी से इजाफा हुआ है। हमारी कला के कद्रदान और खरीदार बढ़ रहे हैं। पर कुल मिलाकर इसका बाजार बहुत असंतुलित है। यह अभी तक दो बड़े शहरों तक सिमटा हुआ है- दिल्ली और मुंबई। या फिर विदेशों में। इसके अलावा इसका कलेक्टर बेस भी बहुत छोटा है। लेकिन 500 से भी कम कलेक्टरों के साथ इस बाजार में अभी बहुत संभावनाएं हैं। यहां चीन का उल्लेख करना जरूरी है। चीन का कला बाजार भारत के मुकाबले 40 गुना बड़ा है। चीन की तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहुंच बनाने के लिए कई दूसरे तरीके तलाशने की जरूरत है।


कारोबारी गतिविधियां बढ़ी: अधिकतर कला विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय कला बाजार का भविष्य बड़े शहरों पर निर्भर नहीं करता। अब वक्त आ गया है जब उसे अपने लिए नई टेरिटरी तलाशनी होगी। यह टेरिटरी उसे छोटे शहरों के रूप में मिल सकती है। सच तो यह है कि पिछले कुछ समय में देश के छोटे शहरों का बहुत तेजी से विकास हुआ है। जयपुर तक को अभी कला बाजार के छोटे शहरों में ही गिना जा रहा है। हालांकि यहां कारोबारी गतिविधियां बढ़ी हैं, जिससे समृद्धि आई है। जैसे-जैसे छोटे शहरों में पैसा आएगा, वैसे-वैसे वहां कला के कद्रदान बढ़ेंगे। राजस्थान में जयपुर, अजमेर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा और भीलवाड़ा के कलाकारों ने देश के आर्ट कलेक्टरों में स्थान बनाना शुरू किया है। जयपुर के कई आर्ट कलेक्टर बताते हैं कि उनके पास दिल्ली, हैदराबाद, सूरत, भोपाल, लखनऊ और गया जैसे शहरों से लोगों के फोन आते हैं। वे यहां के आर्ट और आर्टिस्टों के बारे में जानना चाहते हैं। वे यहां के कलेक्शंस को खरीदने में रुचि दिखाते हैं। उनके पास पैसा तो है लेकिन यहां के आर्ट और आर्टिस्टों तक पहुंच नहीं है। ऐसे लोगों को आर्ट पीसेज उपलब्ध हों, इसके लिए उन्हें राजस्थान में कुछ खास आर्टिस्टों के काम तक सिमटी कला दीर्घाओं से बेहतर किसी तटस्थ प्लेटफार्म की जरूरत है।
विदेशों में भी भारतीय कला के कद्रदानों की कोई कमी नहीं है। कला बाजार को उनकी भी बहुत जरूरत है। पिछले साल एक नीलामी के दौरान एक अमेरिकी ने हुसैन की पेंटिंग को 10 लाख डॉलर से भी अधिक कीमत में खरीदा था। हांगकांग में हुई नीलामी में भी चीनी और इंडोनेशियाई खरीदारों ने भारतीय कला में खासी दिलचस्पी दिखाई थी। यह भारतीय कला बाजार के लिए अच्छा संकेत है। वैसे भारतीय कला के चार स्तंभों की मांग अब भी सबसे ज्यादा है। जिस किसी के भी पास पैसा है वह हुसैन, रजा, सूजा या मेहता के कैनवास को अपने कलेक्शन में शामिल करना चाहता है। मंदी के दिनों में भी उनकी लोकप्रियता या कीमत में कोई कमी नहीं आई थी। इन चार स्तंभों के अलावा जामिनी रॉय, टैगोर, वीएस गायतोंडे, अकबर पदमसी और रामकुमार जैसे कलाकारों की भी मांग है। पिछले महीने लंदन के एक एनालिस्ट ने भारतीय कला बाजार की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें उसने कहा कि बाजार विशेषज्ञ आधुनिक भारतीय कला को लेकर बहुत पॉजिटिव हैं। इसके बावजूद कि अप्रैल 2011 से भारतीय कला बाजार के कॉन्फिडेंस इंडिकेटर में 28 परसेंट की गिरावट हुई थी। बहरहाल विदेश का बाजार तो अपनी जगह है ही, अपने देसी बाजार को भी और मजबूत करने की जरूरत है। अगर वे बाजार जम गए तो देश के उभरते कलाकारों को भी काफी लाभ होगा।
मशहूर भारतीय पेंटर सैय्यद हैदर रजा के पिछले साल भारत लौटने बाद भी उनके काम के दाम स्थिर हैं। रजा भारतीय कला की उस मशहूर चौकड़ी की आखिरी कड़ी हैं, जो कला के बाजार पर राज करती रही है। इनमें से तीन एम।एफ. हुसैन, सूजा और तैय्यब मेहता अब इस दुनिया में नहीं हैं। इसके बावजूद भारतीय कला बाजार में इस चौकड़ी की हिस्सेदारी आधी से ज्यादा है करीब 50 से 60 परसेंट तक। -राहुल सेन