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बुधवार, 15 मई 2013

Art Fund जोखिम भरा है

आर्ट फंड में पैसा लगाने से कई जोखिम जुड़े हुए हैं। जब तक आप इस एसेट क्लास को बखूबी नहीं समझ लेते तब तक इसमें निवेश करने से बचना चाहिए। दिल्ली से मूमल के शुभ चिंतक संजीव सिन्हा ने आर्ट फंड में निवेश से जुड़े  फायदे और नुकसान की जानकारी दी हैं...

कई निवेशक आर्ट फंड में पैसा गंवा चुके हैं। हालांकि जब उन्होंने इसमें निवेश किया था, तब उन्हें बेहतर रिटर्न का वादा किया गया था। कुछ साल पहले भारतीय निवेशकों की आर्ट फंड में दिलचस्पी बढऩी शुरू हुई। तब आर्ट मार्केट भी तेजी के घोड़े पर सवार था। जिस एसेट क्लास में भी तेजी आती है, वहां सट्टेबाज भी पहुंचते हैं। आर्ट फंड के साथ भी ऐसा ही हुआ। तब आर्ट में निवेश करने वालों को अच्छा रिटर्न मिल रहा था।

हिंदुस्तानी पेंटिंग्स के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची बोली लगाई जा रही थी। समसामयिक भारतीय आर्ट को विदेशी खरीदार हाथों-हाथ ले रहे थे। कई लोगों को यह बेहद सुरक्षित निवेश लगा और उन्होंने इसमें पैसा लगाना शुरू कर दिया। कुछ समय तक आर्ट बाजार में तेजी बरकरार रही। अमीर लोग ऊंची कीमत पर आर्ट खरीद रहे थे। हालांकि कुछ साल में हालात बिल्कुल बदल गए हैं। अब आर्ट मार्केट पहले जैसा नहीं रह गया है। ओसियान आर्ट फंड और फर्नवुड आर्ट इनवेस्टमेंट नाकाम रहे। आर्ट इनवेस्टमेंट अब बुरे वक्त से गुजर रहा है।
आज उसका कुछ साल पहले वाला जलवा नहीं है। ऐसे में आर्ट और आर्ट इनवेस्टमेंट में निवेश को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यहां एक सवाल निवेशकों को पूछने की जरूरत है? क्या आर्ट इनवेस्टमेंट आज के हालात में उनके लिए ठीक होगा?
क्या है आर्ट फंड
इससे पहले कि आप किसी नतीजे पर पहुंचें, आइए पहले आर्ट फंड को समझते हैं। आर्ट फंड को लेकर रेग्युलेटर की ओर से साफ  गाइडलाइंस नहीं हैं। साथ ही इसके लिए स्पष्ट नियम भी नहीं हैं। दरअसल, कुछ निवेशक जब एक साथ ट्रस्ट बनाते हैं और आर्ट में निवेश के लिए फंड जमा करते हैं तो उसे आर्ट फंड कहा जाता है। आर्ट फंड काफी हद तक प्राइवेट इक्विटी की तरह होता है। या इसे म्यूचुअल फंड भी कह सकते हैं जो आर्ट में निवेश करता है।
क्या करता है आर्ट फंड
आर्ट फंड  पेंटिंग्स का एक कलेक्शन तैयार करता है, जिसमें बड़े निवेशक पैसा लगा सकते हैं। एएसके वेल्थ एडवाइजर्स के सीईओ और मैनेजिंग पार्टनर राजेश सलूजा का कहना है, 'आर्ट फंड का मकसद निवेशकों को एक अलग एसेट क्लास में पैसा लगाने का विकल्प मुहैया कराना है। इस एसेट क्लास का इक्विटी और डेट प्रोडक्ट्स से कोई लेना-देना नहीं होता। इसमें प्रफेशनल मैनेजरों के रिसर्च की मदद से निवेशकों को आर्ट पूल में पैसा लगाने की सुविधा मिलती है।Ó
तीस प्रतिशत का दावा
निवेशकों की चाहत यह होती है कि आर्ट फंड उन्हें महंगाई से ज्यादा रिटर्न मुहैया कराए। आर्ट फंड इक्विटी या डेट प्रोडक्ट से जुड़ा नहीं होता। ऐसे में माना जाता है कि उनके प्रदर्शन से आर्ट फंड के प्रदर्शन पर असर नहीं पड़ेगा। दुनिया भर में बहुत कम आर्ट फंड हैं, जिनका नियंत्रण सरकारी इकाई मसलन ब्रिटिश रेल पेंशन फंड या चेज मैनहट्टन बैंक जैसे फाइनैंशल इंस्टीट्यूशन के हाथ में रहा है। इनमें से कुछ फंड 30 फीसदी तक के रिटर्न का दावा करते हैं। हालांकि इनका ट्रैक रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है। आर्ट फंड का रिटर्न इस बात पर निर्भर करता है कि फंड के पूल के आर्ट की कितनी डिमांड है। अगर किसी आटिस्र्ट की पेंटिंग्स की डिमांड ज्यादा है और फंड ने उसे कम कीमत पर खरीदा है तो उसे बेचने पर अच्छा रिटर्न हासिल हो सकता है।
नेगेटिव रिटर्न भी
सलूजा का कहना है, 'आर्ट को बेचना इक्विटी या डेट प्रॉडक्ट की तरह आसान नहीं होता। 70 के दशक में जो आर्ट फंड शुरू हुए थे, उनमें से कइयों ने हाल तक महंगाई दर से कम रिटर्न दिया था। कुछ ने तो नेगेटिव रिटर्न भी दिया है। आर्ट फंड में निवेश का मकसद ज्यादा रिटर्न हासिल करना रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इक्विटी से आर्ट फंड के रिटर्न का कोई लेना-देना नहीं होता। ऐसे में आर्ट फंड में निवेश से पोर्टफोलियो डायवसिर्फाई करने में मदद मिलती है।Ó
रियल एस्टेट निवेश जैसा
हालांकि इसके साथ समस्या यह है कि मुश्किल घड़ी में इस तरह के एसेट क्लास जिनका इक्विटी या डेट से कोई लिंक नहीं होता, उनमें भी बदलाव देखा जा सकता है। मिसाल के तौर पर 2008 के वित्तीय संकट के दौरान आर्ट फंड के साथ भी ऐसा ही हुआ। आर्ट इनवेस्टमेंट के साथ सबसे बुरी बात यह है कि इसे आसानी से बेचा नहीं जा सकता। इसका मतलब यह है कि जब इस बाजार में भारी गिरावट आ रही हो तो आप ब्रोकर को फोन करके तत्काल बिकवाली नहीं कर सकते हैं। जानकारों का कहना है कि आर्ट काफी हद तक रियल एस्टेट निवेश की तरह है। जो आर्ट फंड इस बाजार की तेजी के दौरान लॉन्च किए गए थे, उनमें कई बार गिरावट देखी जा चुकी है।
नया कॉन्सेप्ट है
इसके साथ ही रेग्युलेटरी गाइडलाइंस का न होना भी आर्ट इनवेस्टमेंट की राह में सबसे बड़ी बाधा है। आर्ट इनवेस्टमेंट का कॉन्सेप्ट अभी भी शुरुआती अवस्था में है। हालांकि सेबी ने अब तक इनके रेग्युलेशन के लिए गाइडलाइंस नहीं बनाए हैं। इसका मतलब यह है कि जो लोग इसमें पैसा लगा रहे हैं, उन्हें रेग्युलेटर की ओर से कोई सुरक्षा नहीं मिल रही है। इसके अलावा आर्ट फंड में रिस्क काफी ज्यादा होता है। इसमें प्राइस डिस्कवरी का कोई कारगर तरीका नहीं होता।
वैल्यूएशन बेहद मुश्किल
ऐसे में वैल्यूएशन का पता लगाना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में आर्ट फंड में निवेश काफी हद तक इसके पूल में मौजूद आर्ट के बिकने और होल्डिंग की कीमत में बढ़ोतरी पर निर्भर करता है। सलूजा के मुताबिक, 'आर्ट इनवेस्टमेंट में मॉनिटरिंग सिस्टम का अभाव है। साथ ही इसमें रेग्युलेटरी नियंत्रण भी नहीं है। इस वजह से अभी निवेशक इसे लेकर एहतियात बरत रहे हैं।Ó
विशेष योग्यता की मांग
इसके साथ ही निवेश के लिए किसी आर्ट का चुनाव भी विशेष योग्यता की मांग करता है। जो लोग आर्ट में काफी समय से निवेश कर रहे हैं, उन्हें यह पता है कि किसी जाने-माने आर्टिस्ट की सभी पेंटिंग्स की ऊंची कीमत नहीं मिलती है। आर्ट फंड ने जिन कलाकृतियों में निवेश किया है, उनकी जांच से पता चलता है कि इसमें से 30-40 फीसदी की कीमत में ज्यादा बढ़ोतरी की गुंजाइश नहीं है।
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रविवार, 22 जनवरी 2012

छोटे शहरों में बन रही है कला बाजार की नई टेरेटरी

जयपुर के कई आर्ट कलेक्टर बताते हैं कि उनके पास दिल्ली, हैदराबाद, सूरत, भोपाल, लखनऊ और गया जैसे शहरों से लोगों के फोन आते हैं। वे यहां के आर्ट और आर्टिस्टों के बारे में जानना चाहते हैं। वे यहां के कलेक्शंस को खरीदने में रुचि दिखाते हैं। उनके पास पैसा तो है लेकिन यहां के आर्ट और आर्टिस्टों तक पहुंच नहीं है।
वैसे तो भारतीय कला बाजार को मॉनिटर करने का कोई ठोस तंत्र विकसित नहीं हो पाया है, फिर भी एक्सपट्र्स की मानें, तो यह लगभग एक हजार करोड़ से सोलह सौ करोड़ के बीच होगा। पिछले दस सालों में उसमें तेजी से इजाफा हुआ है। हमारी कला के कद्रदान और खरीदार बढ़ रहे हैं। पर कुल मिलाकर इसका बाजार बहुत असंतुलित है। यह अभी तक दो बड़े शहरों तक सिमटा हुआ है- दिल्ली और मुंबई। या फिर विदेशों में। इसके अलावा इसका कलेक्टर बेस भी बहुत छोटा है। लेकिन 500 से भी कम कलेक्टरों के साथ इस बाजार में अभी बहुत संभावनाएं हैं। यहां चीन का उल्लेख करना जरूरी है। चीन का कला बाजार भारत के मुकाबले 40 गुना बड़ा है। चीन की तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहुंच बनाने के लिए कई दूसरे तरीके तलाशने की जरूरत है।


कारोबारी गतिविधियां बढ़ी: अधिकतर कला विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय कला बाजार का भविष्य बड़े शहरों पर निर्भर नहीं करता। अब वक्त आ गया है जब उसे अपने लिए नई टेरिटरी तलाशनी होगी। यह टेरिटरी उसे छोटे शहरों के रूप में मिल सकती है। सच तो यह है कि पिछले कुछ समय में देश के छोटे शहरों का बहुत तेजी से विकास हुआ है। जयपुर तक को अभी कला बाजार के छोटे शहरों में ही गिना जा रहा है। हालांकि यहां कारोबारी गतिविधियां बढ़ी हैं, जिससे समृद्धि आई है। जैसे-जैसे छोटे शहरों में पैसा आएगा, वैसे-वैसे वहां कला के कद्रदान बढ़ेंगे। राजस्थान में जयपुर, अजमेर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा और भीलवाड़ा के कलाकारों ने देश के आर्ट कलेक्टरों में स्थान बनाना शुरू किया है। जयपुर के कई आर्ट कलेक्टर बताते हैं कि उनके पास दिल्ली, हैदराबाद, सूरत, भोपाल, लखनऊ और गया जैसे शहरों से लोगों के फोन आते हैं। वे यहां के आर्ट और आर्टिस्टों के बारे में जानना चाहते हैं। वे यहां के कलेक्शंस को खरीदने में रुचि दिखाते हैं। उनके पास पैसा तो है लेकिन यहां के आर्ट और आर्टिस्टों तक पहुंच नहीं है। ऐसे लोगों को आर्ट पीसेज उपलब्ध हों, इसके लिए उन्हें राजस्थान में कुछ खास आर्टिस्टों के काम तक सिमटी कला दीर्घाओं से बेहतर किसी तटस्थ प्लेटफार्म की जरूरत है।
विदेशों में भी भारतीय कला के कद्रदानों की कोई कमी नहीं है। कला बाजार को उनकी भी बहुत जरूरत है। पिछले साल एक नीलामी के दौरान एक अमेरिकी ने हुसैन की पेंटिंग को 10 लाख डॉलर से भी अधिक कीमत में खरीदा था। हांगकांग में हुई नीलामी में भी चीनी और इंडोनेशियाई खरीदारों ने भारतीय कला में खासी दिलचस्पी दिखाई थी। यह भारतीय कला बाजार के लिए अच्छा संकेत है। वैसे भारतीय कला के चार स्तंभों की मांग अब भी सबसे ज्यादा है। जिस किसी के भी पास पैसा है वह हुसैन, रजा, सूजा या मेहता के कैनवास को अपने कलेक्शन में शामिल करना चाहता है। मंदी के दिनों में भी उनकी लोकप्रियता या कीमत में कोई कमी नहीं आई थी। इन चार स्तंभों के अलावा जामिनी रॉय, टैगोर, वीएस गायतोंडे, अकबर पदमसी और रामकुमार जैसे कलाकारों की भी मांग है। पिछले महीने लंदन के एक एनालिस्ट ने भारतीय कला बाजार की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें उसने कहा कि बाजार विशेषज्ञ आधुनिक भारतीय कला को लेकर बहुत पॉजिटिव हैं। इसके बावजूद कि अप्रैल 2011 से भारतीय कला बाजार के कॉन्फिडेंस इंडिकेटर में 28 परसेंट की गिरावट हुई थी। बहरहाल विदेश का बाजार तो अपनी जगह है ही, अपने देसी बाजार को भी और मजबूत करने की जरूरत है। अगर वे बाजार जम गए तो देश के उभरते कलाकारों को भी काफी लाभ होगा।
मशहूर भारतीय पेंटर सैय्यद हैदर रजा के पिछले साल भारत लौटने बाद भी उनके काम के दाम स्थिर हैं। रजा भारतीय कला की उस मशहूर चौकड़ी की आखिरी कड़ी हैं, जो कला के बाजार पर राज करती रही है। इनमें से तीन एम।एफ. हुसैन, सूजा और तैय्यब मेहता अब इस दुनिया में नहीं हैं। इसके बावजूद भारतीय कला बाजार में इस चौकड़ी की हिस्सेदारी आधी से ज्यादा है करीब 50 से 60 परसेंट तक। -राहुल सेन

बुधवार, 24 जून 2009

कला बाज़ार पर भी मंदी की मार


भूमंडलीय मंदी की मार कला बाज़ार पर भी पड़ी है और इसकी मिसाल बना, अमेरिका के मैनहटन का मशहूर कला मेला जहां सस्ती कीमतों में पेंटिंग्स खऱीदी गईं। बाज़ार में मांग को कम देखते हुए कलाकार और मेला आयोजक बस धुंधली सी उम्मीद करते रहे कि देखें कितनी सामग्री कितने दामों तक बिकती है, लेकिन कुल मिलाकर उन्हें मायूसी हाथ लगी।

आठ साल से जारी ये कला मेला नए खऱीददारों को आकर्षित करने के लिए शुरू हुआ था। ऐसे खऱीददार जो कला के कद्रदान हैं लेकिन जिनकी जेबें भारी भरकम नहीं। पेंटिंग्स की कीमतों की रेंज 75 डॉलर से लेकर दस हज़ार डॉलर तक रखी गयी थीं। ज़्यादातर काम पांच हज़ार डॉलर या इससे कम कीमत वाला था। ऐसी आकर्षक कीमतों वाली पेंटिंग मिल जाए तो क्या कहने। लेकिन मंदी के दौर में ग्राहकों को जुटाना इस मेले के लिए इस बार टेढ़ी खीर साबित हुआ। मेले के आयोजकों का कहना है कि भीड़ तो जुटी लेकिन ज़्यादातर लोग ऐसे थे जो देखते निहारते और सराहना करते और फिर आगे बढ़ जाते। पिछले साल इस कला मेले में 70 आर्ट गैलरियों ने भाग लिया था। इस बार 64 कला दीर्घाएं आयी।

कलाकारों का भी कहना है कि सस्ती आर्ट की मांग का संघर्ष अभी जारी है। आर्थिक मंदी ने कला बाज़ार को भी हिला दिया है। कला समाग्री की मशहूर नीलामीकार कंपनी सदेबी ने पिछले माह ही नीलामी की बिक्री में 71 फ़ीसदी गिरावट दर्ज की थी।अब एक सवाल ये भी है कि सस्ते दामों की ये पेंटिंग्स स्तरीय भी हैं या साधारण दर्जे का काम यहां रखा गया था। तो ये बता दें कि ऐसा बिल्कुल नहीं। मेला भले ही सस्ती कला सामग्रियों का हो, लेकिन स्तर और गुणवत्ता में वो आला ही माना जाता रहा है और ये कोई नहीं जानता कि किस पेंटर की कौन सी कृति कब कला बाज़ार में हिट हो जाए। फिर वो पेंटर जाना माना हो या कोई अंजाना शख्स।

कला बाज़ार आमतौर पर उस बाज़ार फलसफे के साथ दुनिया भर में छाया था कि खरीददारों के लिए कोई आर्ट पीस महज़ सौंदर्यबोध या कला तृप्ति का ज़रिया नहीं थी, वो एक परिसंपत्ति भी थी। वैसे ही जैसे मकान, वाहन या ज़मीन या एक एस्टेट, जो घर के ड्राइंगरूम की दीवार पर सजा भी है और जिसके दाम अबूझ ढंग से बढ़ते रहते हैं। वो एक मुनाफे का सौदा माना जाता रहा है। लेकिन न्यूयार्क कला मेले में आए कलाकारों को लगता है कि इस मेले में आने वाले ग्राहकों की अब वैसी मनस्थिति या वैसी कार्ययोजना या रणनीति नहीं दिखी, उन्हें तो बस अपनी जेब और अपने भविष्य के खर्चे ही दिखते रहे।मेले में आए कुछ ग्राहकों का तो साफ़ कहना था कि वे तभी कोई चीज़ खऱीदने की सोचेंगे अगर उसमें वित्तीय सुरक्षा की गारंटी हो।

यानी अब कला के खऱीददार भी फूंक फूंक कर गैलरियों और वहां टंगी तस्वीरों को निहार रहे हैं। दुनिया भर से सस्ती कला सामग्रियां लेकर आए वहां के आर्ट गैलरी वाले इस मेले में भीड़ भाड़ और भव्यता के बीच ज़्यादातर कभी अपने सामान, कभी अपने स्टॉल से गुजऱते दर्शकों को निहारते रहे। शायद कोई ग्राहक हो और वो रुक जाए। लेकिन क्या करें चाल तो सिर्फ बाज़ार की धीमी हुई है।