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सोमवार, 26 नवंबर 2012

Bani-Thani आखिर किसने बनाई थी बनी-ठनी

श्रीराधा रूप में चित्रित 'बणी-ठणी' के हाथ में कमल देकर लक्ष्मी की तरह बताया है वहीं नारी के कमला और पद्मिनी रूप को भी दर्शाया है। श्रीराधा के रूप में इसे आद्याशक्ति भी माना है।  पाठ्यक्रम की पुस्तकों को आधार माने तो जहां चित्रकारी के तहत 'बणी-ठणी' की मदकारी और खुलाई को शास्त्र विधान का 'अतिक्रमणÓ माना जा सकता है वहीं नारी रूपों के निरूपण के शिल्प में इसे 'लांछन' कहा जा सकता है। लेकिन विशुद्ध शैली और शास्त्र विधान से परे यह 'बणी-ठणी' अपने किसी भी आम दर्शक को किसी चुंबक की तरह न केवल खींचती है बल्कि देर तक बांधे रखने में सफल होती है। कलाप्रेमी राजा या चित्रकार की तो बात ही अलग है।
स मय-समय उत्पन्न परिस्थितियों से जो साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि 'बणी-ठणी' का प्रोट्रेट संभवत: चित्रकार निहाल चंद और राजा सावंत सिंह की साझा कृति है। महाराज सावंत सिंह की मूल कृति से लेकर राज चित्रकार निहाल चंद की अंतिम 'बणी-ठणी' तैयार होने का यह सिलसिला संवत 1755 से 1757 तक चला। इस बीच अन्य चित्र भी बनते रहे। मारवाड़ शैली की उन्नत कलम का यह स्वर्णकाल कहा जा सकता है।
नागर रमणी बणी-ठणी जी के इस विलक्षण पोटे्रट का विवेचन करते हुए यहां हम देखेगे कि इसमें आरूढ़ साक्षात सौन्दर्य गर्विता इस यौवना के यह भाव किस स्तर पर महसूस किए गए? 'बणी-ठणी' ऐसी विलक्षण क्यों और कैसे हुई? इसके सौन्दर्यपरक और शैली मार्गिय शास्त्रीय कारण क्या रहे होगें?
1. मुनि वात्स्यायन ने चित्रशिल्प के षडंगों में संतुलित समायोजन किया था। बाद में उसे चित्रकार अवनीद्रनाथ ठाकुर और पृथ्वी कुमार अग्रवाल ने अपनी पुस्तकों में और सरल किया। अब चित्रकला के विद्यार्थियों को यहां रूप भेद, प्रमाण, भाव, सादृश्य, लावण्य योजना और वर्णिका भंग के संबंध में विवरण बताने का कोई औचित्य नहीं है। यह सब पाठ्यक्रम में उपलब्ध हैं। 'बणी-ठणी' में वह समाहित हैं दूसरी ओर ग्यारहवीं सदी में भोज ने चित्रकर्म या विन्यास के अष्ठांग बताए हैं। यहां चार अंगो को महत्ता दी गई है, शेष की चर्चा पनुरावृति ही होगी।
मध्यकाल में मुगल बादशाह अकबर के जमाने में राजस्थानी और ईरानी हिरात कलम का मेल कराके बाग-बगीचों और व्यक्तिचित्रों को प्रमुखता दी गई। उस काल के प्र्रोट्रेट्स का भी 'बणी-ठणी' पर असर नजर आया। 'बणी-ठणी'  के चित्रकार स्वयं कश्मीरी थे। वहां ऐसे आवक्ष छविचित्रों को शबीह कहा जाता था। ऐसे में 'बणी-ठणी' पर इन शैलियों का पूरा प्रभाव पड़ा और एकचश्म टिपाई, के साथ गदकारी और खुलाई की खुली छाया 'बणी-ठणी' पर छाई रही। इसमें जहां मुगलकालीन बेगमों सा सुबुकपन और नाजुकपन है वहीं झीना ओढऩा कश्मीरी कहानी कहता है। किशनगढ़ के राजमहलों की पृष्ठभूमि में उद्यानों और जलाशयों में नौका विहार के अनेक चित्र हैं, होली, दीवाली और विभिन्न केलि क्रिड़ाओं के अनेकों चित्र हैं जिनमें राजा सावंत सिंह और उनकी प्रिय माडल चित्रित हैं। बहुदा यह प्रस्तुति राधा-माधव के नाम से है, लेकिन यहां हम अपनी 'बणी-ठणी' से ही सरोकार रखेगें।

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

खुद में खोए कलाकारों का जमावड़ा, अगले महीने दिल्ली में...

  दिल्ली में अगले महीने आईफैक्स में आयोजन

मूमल नेटवर्क, नई दिल्ली। राजधानी की आईफैक्स आर्ट गैलेरी में नवम्बर माह में देश भरके अनुभवी चित्रकारों के साथ युवा कूची के तेवर भी देखने को मिलेंगे।
'पेन्ट फार जस्टिस' के नाम से होने वाले इस प्रदर्शन में मुख्यतया दो विचारों का दर्शन समेटने का प्रयास होगा। पहला ये कि कलाकार उन विषयों को अपनी कृतियों में उकेरे जिन से आम व्यक्ति मानसिक रूप से घायल हुआ है। दूसरा विचार यह है कि इस आयोजन के जरिए उन कलाकारों को मुख्य सामाजिक धारा में जोड़ा जाए जो अभी खुद में ही खोए हुए हैं।

इस आयोजन के लिए बड़े पैमाने पर व्यवसायिक व्यवस्थाएं की गई हैं, इसमें भाग लेने के लिए प्रत्येक कलाकार से 1100 रुपए शुल्क लिया गया है। इसके प्रचार-प्रसार के लिए पेशेवर लोगों की सेवाएं ली गई हैं, यह बात अलग है कि देशभर में वरिष्ठ कलाकारों के विभिन्न गुटों ने इस आयोजन को दरकिनार किया है।

इस आयोजन में प्रत्येक राज्य से ग्यारह-ग्यारह कलाकारों के दल भाग लेंगे। इन कलाकारों के दल मेंं एक सीनियर आर्टिस्ट उनका कन्वीनर होगा। राजस्थान से जाने-माने चित्रकार और कला शिक्षक डा. अनुपम भटनागर के प्रतिनिधित्व में जो दल इस प्रदर्शन में भाग लेगा उसमें जयपुर से रमेश शर्मा, जोधपुर से प्रदिप्तों दास, अजमेर से रूपाली माथुर, कोटा से डा. सुरेश प्रजापति, कुचामन सिटी से गिरीश, भीलवाड़ा से अनिल मोहनपुरिया, एस.एन. सोनी, निशा कानावत व सौरव भट्ट, उदयपुर से डा. मोहनलाल जाट, व बांसवाड़ा से स्वयं डा. अनुपम भटनागर शामिल हैं।
पेंन्ट फार जस्टिस के लिए राजस्थान से डा. अनुपम भटनागर की नई कृति 'ओह! मेरा बचपन'  इसे केनवास पर एक्रेलिक रंगों से सजाया गया है। इसका आकार है 24 गुणा 30 इंच।  कृति पर कलाकार ने कविता भी लिखी है।
  कविता
ओह! मेरा बचपन
कोई है?
जो दिलाए मुक्ति;
बैग के बोझ से
और
लौटा दे मेरा बचपन
ए बी सी और वन टू थ्री ने
खो दिया जिसे...
बैग, बोतल, टिफिन का
कंधे तोड़ता बोझ
सभी ने किया बदरंग
बचपन का रंग...
नानी की कहानियां
आइस-पाइस, छुप्पा-छुप्पी
लंगड़ी-टांग, पकड़म-पकड़ाई
सब... वो-मारा वो-काटा
मेरी गुडिय़ा
उसकी शादी
खेल मेरे बचपन के
बस रस्में निभाई...
सबका गौना सबकी विदाई
फिर एक दिन दब गया
बैग तले बचपन
ओह! मेरा बचपन
झूल रहा है बैग में...
डा अनुपम भटनागर द्वारा अपनी कृति पर लिखी पहली कविता