रविवार, 22 जनवरी 2012

छोटे शहरों में बन रही है कला बाजार की नई टेरेटरी

जयपुर के कई आर्ट कलेक्टर बताते हैं कि उनके पास दिल्ली, हैदराबाद, सूरत, भोपाल, लखनऊ और गया जैसे शहरों से लोगों के फोन आते हैं। वे यहां के आर्ट और आर्टिस्टों के बारे में जानना चाहते हैं। वे यहां के कलेक्शंस को खरीदने में रुचि दिखाते हैं। उनके पास पैसा तो है लेकिन यहां के आर्ट और आर्टिस्टों तक पहुंच नहीं है।
वैसे तो भारतीय कला बाजार को मॉनिटर करने का कोई ठोस तंत्र विकसित नहीं हो पाया है, फिर भी एक्सपट्र्स की मानें, तो यह लगभग एक हजार करोड़ से सोलह सौ करोड़ के बीच होगा। पिछले दस सालों में उसमें तेजी से इजाफा हुआ है। हमारी कला के कद्रदान और खरीदार बढ़ रहे हैं। पर कुल मिलाकर इसका बाजार बहुत असंतुलित है। यह अभी तक दो बड़े शहरों तक सिमटा हुआ है- दिल्ली और मुंबई। या फिर विदेशों में। इसके अलावा इसका कलेक्टर बेस भी बहुत छोटा है। लेकिन 500 से भी कम कलेक्टरों के साथ इस बाजार में अभी बहुत संभावनाएं हैं। यहां चीन का उल्लेख करना जरूरी है। चीन का कला बाजार भारत के मुकाबले 40 गुना बड़ा है। चीन की तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहुंच बनाने के लिए कई दूसरे तरीके तलाशने की जरूरत है।


कारोबारी गतिविधियां बढ़ी: अधिकतर कला विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय कला बाजार का भविष्य बड़े शहरों पर निर्भर नहीं करता। अब वक्त आ गया है जब उसे अपने लिए नई टेरिटरी तलाशनी होगी। यह टेरिटरी उसे छोटे शहरों के रूप में मिल सकती है। सच तो यह है कि पिछले कुछ समय में देश के छोटे शहरों का बहुत तेजी से विकास हुआ है। जयपुर तक को अभी कला बाजार के छोटे शहरों में ही गिना जा रहा है। हालांकि यहां कारोबारी गतिविधियां बढ़ी हैं, जिससे समृद्धि आई है। जैसे-जैसे छोटे शहरों में पैसा आएगा, वैसे-वैसे वहां कला के कद्रदान बढ़ेंगे। राजस्थान में जयपुर, अजमेर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा और भीलवाड़ा के कलाकारों ने देश के आर्ट कलेक्टरों में स्थान बनाना शुरू किया है। जयपुर के कई आर्ट कलेक्टर बताते हैं कि उनके पास दिल्ली, हैदराबाद, सूरत, भोपाल, लखनऊ और गया जैसे शहरों से लोगों के फोन आते हैं। वे यहां के आर्ट और आर्टिस्टों के बारे में जानना चाहते हैं। वे यहां के कलेक्शंस को खरीदने में रुचि दिखाते हैं। उनके पास पैसा तो है लेकिन यहां के आर्ट और आर्टिस्टों तक पहुंच नहीं है। ऐसे लोगों को आर्ट पीसेज उपलब्ध हों, इसके लिए उन्हें राजस्थान में कुछ खास आर्टिस्टों के काम तक सिमटी कला दीर्घाओं से बेहतर किसी तटस्थ प्लेटफार्म की जरूरत है।
विदेशों में भी भारतीय कला के कद्रदानों की कोई कमी नहीं है। कला बाजार को उनकी भी बहुत जरूरत है। पिछले साल एक नीलामी के दौरान एक अमेरिकी ने हुसैन की पेंटिंग को 10 लाख डॉलर से भी अधिक कीमत में खरीदा था। हांगकांग में हुई नीलामी में भी चीनी और इंडोनेशियाई खरीदारों ने भारतीय कला में खासी दिलचस्पी दिखाई थी। यह भारतीय कला बाजार के लिए अच्छा संकेत है। वैसे भारतीय कला के चार स्तंभों की मांग अब भी सबसे ज्यादा है। जिस किसी के भी पास पैसा है वह हुसैन, रजा, सूजा या मेहता के कैनवास को अपने कलेक्शन में शामिल करना चाहता है। मंदी के दिनों में भी उनकी लोकप्रियता या कीमत में कोई कमी नहीं आई थी। इन चार स्तंभों के अलावा जामिनी रॉय, टैगोर, वीएस गायतोंडे, अकबर पदमसी और रामकुमार जैसे कलाकारों की भी मांग है। पिछले महीने लंदन के एक एनालिस्ट ने भारतीय कला बाजार की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें उसने कहा कि बाजार विशेषज्ञ आधुनिक भारतीय कला को लेकर बहुत पॉजिटिव हैं। इसके बावजूद कि अप्रैल 2011 से भारतीय कला बाजार के कॉन्फिडेंस इंडिकेटर में 28 परसेंट की गिरावट हुई थी। बहरहाल विदेश का बाजार तो अपनी जगह है ही, अपने देसी बाजार को भी और मजबूत करने की जरूरत है। अगर वे बाजार जम गए तो देश के उभरते कलाकारों को भी काफी लाभ होगा।
मशहूर भारतीय पेंटर सैय्यद हैदर रजा के पिछले साल भारत लौटने बाद भी उनके काम के दाम स्थिर हैं। रजा भारतीय कला की उस मशहूर चौकड़ी की आखिरी कड़ी हैं, जो कला के बाजार पर राज करती रही है। इनमें से तीन एम।एफ. हुसैन, सूजा और तैय्यब मेहता अब इस दुनिया में नहीं हैं। इसके बावजूद भारतीय कला बाजार में इस चौकड़ी की हिस्सेदारी आधी से ज्यादा है करीब 50 से 60 परसेंट तक। -राहुल सेन

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

एसएसजी पारीक गल्र्स की नवीन अभिव्यक्तियों का सृजन

मूमल नेटवर्क, जयपुर। चौमू के एसएसजी पारीक स्नातकोत्तर गल्र्स कॉलेज की ड्राइंग सेक्शन की छात्राओं की पेंटिंग्स जवाहर कला केंद्र की सुरेख आर्ट गैलेरी 10 से 12 जनवरी तक आयोजित की गई।
इस साल प्रदर्शनी में कॉलेज स्टूडेंट्स की अनेक नई अभिव्यक्तियां देखने को मिली। किसी ने अपनी तूलिका के जरिए प्रकृति के रंगों को अपनी अभिव्यक्ति में पिरोया, तो किसी ने मातृत्व प्रेम को उजागर किया। ं
प्रदर्शनी का उद्घाटन उद्योग मंत्री राजेंद्र पारीक ने किया। कॉलेज के फाइन आट्र्स विभाग के प्रमुख दिनेश कुमावत के दिशा निर्देशन मेें इस साल 30 पेंटिंग्स प्रदर्शित की गई। इन पेंटिंग्स में छात्राओं ने प्रकृति के साथ-साथ गॉड फिगर्स को शामिल किया है। साथ ही नारी की भी प्रतिमाएं बनाई हैं।
इन पेंटिंग में अलग-अलग थीम पर ऑयल कलर्स को बेहतरीन तरीके से कैनवास पर उकेरा गया है। सभी थीम कंपोजिंग, मानवाकृति, प्राकृतिक और सेल्फ कंपोजिंग पर आधारित हैं। कुमावत ने बताया कि इस एग्जिबिशन का मुख्य उद्देश्य फाइन आट्र्स की छात्राओं को कस्बे से निकल कर शहर की कला गतिविधियों से रूबरू कराना था।
पहले ही दिन सेल
प्रदर्शनी में खासतौर पर छात्राओं की बनाई पेंटिंग्स में से पहले दिन तीन पेंटिंग की सेल भी हुई। ऐसे में सभी छात्राएं उत्साहित नजर आ रही थीं। एक छात्रा ने बताया कि यह उनकी पहली पेंटिंग है। उल्लेखनीय है कि जयपुर के कला बाजार में पिछले कुछ समय से बायर्स का रुझान पुराने या स्थापित कलाकारों के काम के बजाय बेहतर संभावनाओं वाले नए हस्ताक्षरों की ओर अधिक होता जा रहा है।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

ये सिंकोले क्या है?

चित्रकला की दुनिया में एक नया शब्द आया है 'सिंकोले'। यह एक चाइनिज शब्द है, जिसका भावार्थ है, 'सिं' अर्थात कोलाज की तरह तकनीक। और 'कोले' का अर्थ होता है चिपकाना या पेस्ट करना। गोंद के स्पे्र द्वारा लिथो या जिंग प्लेट पर सिंकोले किया जाता है। इस क्षेत्र में जहां एक ओर दिल्ली के कलाकार देवराज डोकोजी विशेषज्ञता रखते हैं, वहीं राजस्थान के जयपुर में एकमात्र छात्र कलाकार गौरी शंकर जांगिड़ इस तकनीक पर कार्य कर रहें हैं। यहां प्रस्तुत है सिंकोले तकनीक से निर्मित एक कृति।

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

अनूपम भटनागर का कला जगत

'मूमल' के कला ब्लॉग "गलियारा" से जुड़े डा। अनूपम भटनागर मूल रूप से नजाकत की नगरी लखनऊ से हैं। इनका जन्म 4 फरवरी 1955 में उत्तरप्रदेश के हापुड़ शहर में हुआ। बहुत छोटी आयु में पिता के देहान्त के बाद ताऊ स्व. श्री बृजमनोहर नाथ भटनागर के स्नेह संरक्षण में पले बढ़े। आरम्भिक शिक्षा फूलों की घाटी जोशी मठ में हुई फिर मिडिल से स्नातकोत्तर तक की शिक्षा सहारनपुर में मिली।

चाचा श्री रामेश्वर नाथ भटनागर की पेंन्टिंग व खूबसूरत हैंडराइटिंग से आकर्षित होकर अनुपम भी पेंन्टिंग करने लगे और चाचा से बाकायदा राइटिंग के गुण सीखे। स्कूल में खेलकूद का ज्यादातर वक्त रंगों से खेलकर ही बीतता था। तीसरी, चौथी कक्षा में पढ़ते हुए ही फूलों, पत्तियों व मसालों के रंग बनाकर सबकों अचम्भित कर देते थे। युवा होते-होते रंगों से छेड़छाड़ के चलते रिश्ता और प्रघाढ़ हुआ। घरवालों के विरोध के बावजूद अपने ड्राईंग अध्यापक की मदद से इस रिश्ते को कायम रखा और इस विधा में उच्च शिक्षा प्राप्त की। इन्हीं दिनों जीवन संगिनी के रूप में नम्रता ने नाता जुड़ा। रंगों से अनुपम के गहरे रिश्तों के बावजूद पिछले पच्चीस बरस से नम्रता जी इनसे बखूबी निभा रही हैं। आगामी 26 मई को वे अपनी शादी की सिलवर जुबली मनाने जा रहे हैं।

बहुत कम लोग जानते हैं कि आज चित्रकला की दुनियां में बड़े दाम वाला बड़ा नाम बन चुके अनुपम भटनागर ने कभी अपनी पढ़ाई, कैनवास रंग व ब्रश का खर्चा निकालने के लिए खूब ट्यूशनस पढ़ाई हैं। एम.ए.के दौरान कॉलेज के छात्र प्रेसिडेन्ट रहने के बावजूद भी खुद को संयमित रखा और व्यर्थ समय न गंवाकर चित्र साधना में लगे रहे और अनुपम बन गए।अनुपम आज अजमेर स्थित डीएवी कॉलेज में ड्राईग प्रोफेसर के रूप में छात्रों के प्रिय अध्यापक है। शिक्षण की जिम्मेदारी निभाने के साथ 'आकार' गु्रप व आर्ट टीचर्स की संस्था वीएएसटी के शीर्ष पदों को सुशोभित कर रहे है। देश-विदेश में इनके चित्रों की अनगिनित एकल व ग्रुप प्रदर्शनियां आयोजित हो चुकी हैं।

लोग इनके बारे में कितना जानते हैं और जानना चाहते हैं इसका अंदाजा केवल इसी से लग जाता है कि इंटरनेट की दुनियां के सबसे बड़े सर्च इंजन 'गूगल' पर हिन्दी में डा. अनुपम भटनागर का नाम टाइप करने पर पहले पृष्ठ के सभी 10 स्थानों पर इन्हीं का वर्णन मिलता है। जाहिर है इस व्यक्तित्व की देखरेख में अब 'मूमल' के ब्लॉग भी 'अनुपम' होंगे।

बुधवार, 24 जून 2009

कला बाज़ार पर भी मंदी की मार


भूमंडलीय मंदी की मार कला बाज़ार पर भी पड़ी है और इसकी मिसाल बना, अमेरिका के मैनहटन का मशहूर कला मेला जहां सस्ती कीमतों में पेंटिंग्स खऱीदी गईं। बाज़ार में मांग को कम देखते हुए कलाकार और मेला आयोजक बस धुंधली सी उम्मीद करते रहे कि देखें कितनी सामग्री कितने दामों तक बिकती है, लेकिन कुल मिलाकर उन्हें मायूसी हाथ लगी।

आठ साल से जारी ये कला मेला नए खऱीददारों को आकर्षित करने के लिए शुरू हुआ था। ऐसे खऱीददार जो कला के कद्रदान हैं लेकिन जिनकी जेबें भारी भरकम नहीं। पेंटिंग्स की कीमतों की रेंज 75 डॉलर से लेकर दस हज़ार डॉलर तक रखी गयी थीं। ज़्यादातर काम पांच हज़ार डॉलर या इससे कम कीमत वाला था। ऐसी आकर्षक कीमतों वाली पेंटिंग मिल जाए तो क्या कहने। लेकिन मंदी के दौर में ग्राहकों को जुटाना इस मेले के लिए इस बार टेढ़ी खीर साबित हुआ। मेले के आयोजकों का कहना है कि भीड़ तो जुटी लेकिन ज़्यादातर लोग ऐसे थे जो देखते निहारते और सराहना करते और फिर आगे बढ़ जाते। पिछले साल इस कला मेले में 70 आर्ट गैलरियों ने भाग लिया था। इस बार 64 कला दीर्घाएं आयी।

कलाकारों का भी कहना है कि सस्ती आर्ट की मांग का संघर्ष अभी जारी है। आर्थिक मंदी ने कला बाज़ार को भी हिला दिया है। कला समाग्री की मशहूर नीलामीकार कंपनी सदेबी ने पिछले माह ही नीलामी की बिक्री में 71 फ़ीसदी गिरावट दर्ज की थी।अब एक सवाल ये भी है कि सस्ते दामों की ये पेंटिंग्स स्तरीय भी हैं या साधारण दर्जे का काम यहां रखा गया था। तो ये बता दें कि ऐसा बिल्कुल नहीं। मेला भले ही सस्ती कला सामग्रियों का हो, लेकिन स्तर और गुणवत्ता में वो आला ही माना जाता रहा है और ये कोई नहीं जानता कि किस पेंटर की कौन सी कृति कब कला बाज़ार में हिट हो जाए। फिर वो पेंटर जाना माना हो या कोई अंजाना शख्स।

कला बाज़ार आमतौर पर उस बाज़ार फलसफे के साथ दुनिया भर में छाया था कि खरीददारों के लिए कोई आर्ट पीस महज़ सौंदर्यबोध या कला तृप्ति का ज़रिया नहीं थी, वो एक परिसंपत्ति भी थी। वैसे ही जैसे मकान, वाहन या ज़मीन या एक एस्टेट, जो घर के ड्राइंगरूम की दीवार पर सजा भी है और जिसके दाम अबूझ ढंग से बढ़ते रहते हैं। वो एक मुनाफे का सौदा माना जाता रहा है। लेकिन न्यूयार्क कला मेले में आए कलाकारों को लगता है कि इस मेले में आने वाले ग्राहकों की अब वैसी मनस्थिति या वैसी कार्ययोजना या रणनीति नहीं दिखी, उन्हें तो बस अपनी जेब और अपने भविष्य के खर्चे ही दिखते रहे।मेले में आए कुछ ग्राहकों का तो साफ़ कहना था कि वे तभी कोई चीज़ खऱीदने की सोचेंगे अगर उसमें वित्तीय सुरक्षा की गारंटी हो।

यानी अब कला के खऱीददार भी फूंक फूंक कर गैलरियों और वहां टंगी तस्वीरों को निहार रहे हैं। दुनिया भर से सस्ती कला सामग्रियां लेकर आए वहां के आर्ट गैलरी वाले इस मेले में भीड़ भाड़ और भव्यता के बीच ज़्यादातर कभी अपने सामान, कभी अपने स्टॉल से गुजऱते दर्शकों को निहारते रहे। शायद कोई ग्राहक हो और वो रुक जाए। लेकिन क्या करें चाल तो सिर्फ बाज़ार की धीमी हुई है।

मंगलवार, 2 जून 2009

रंग रसिया- एक चित्रकार की कहानी

'रंग रसिया' पुरातन भारतीय उपन्यास 'राजा रवि वर्मा' पर आधारित है जिसकी रचना प्रसिद्ध उपन्यासकार व लेखक रणजीत देसाई ने की है। यह उपन्यास 19वीं सदी के भारतीय मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा की जिंदगी के इर्द-गिर्द घूमती है। यह धार्मिक असहनशीलता एवं कट्टरवादियों द्वारा भावनाओं की स्वतंत्रता पर लगी पाबंदी से रूबरू कराती है जो वर्तमान समाज के लिए भी अहम सवाल है। हिंदू देवताओं की नग् तस्वीर चित्रित करने के कारण उन पर अश्लीलता, अनैतिकता एवं जन साधारण की धार्मिक भावनाओं का हनन करने का गंदा व अभद्र आरोप लगाने के साथ उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। एक कलाकार व उसकी प्रेरणा सुगंधा की प्रेम कहानी शुरू होने के साथ ही कोर्ट की प्रक्रियाएं भी शुरू हो जाती है। दोनों मिलकर उत्कृष्ट चित्रों को निर्मित करते हैं या यूं कहें कि सुगंधा की खूबसूरती से प्रेरित होकर ही उन्हें पारंपरिक साहित्य व भारतीय पुराणों पर आधारित चित्रों को बनाने की प्रेरणा मिलती है और उनकी यहीं प्रेरणा अंतत: प्यार बनती है। यह बेहद खूबसूरती व आम फिल्मों की कहानियों से अलग हटकर बनी ऐसी फिल्म हैं जो मशहूर भारतीय कलाकार व समाज सुधारक राजा रवि वर्मा की जिंदगी को चित्रित करती है। राजा रवि वर्मा ने हमेशा यहीं चाहा कि उनकी कला आम आदमी तक पहुंचे। अपनी कल्पना व सृजनात्मकता से वे हिंदू देवी-देवताओं को महलों व मंदिरों की चार दीवारी से बाहर लाएं इस फिल्म में दर्शकों को शेक्सपियर की प्रेम कहानी की झलक भी मिलेगी। यह एक कलाकार व उसकी प्रेरणा के बीच की कहानी, जज्बातों व धोखे की मूल गाथा है। केतन मेहता की यह सराहनीय पहल न सिर्फ भारतीय इतिहास के तमाम पहलुओं को ही उजागर करती है बल्कि समकालीन समाज में एक कलाकार की आजादी, नैतिक नीतियों, सेंसरशिप व धर्म के प्रति असहनशीलता पर भी सवाल उठाती है।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

कद्रदानों को देना चाहते है कलाकृतियाँ

जीपी मल्ल को पेड़ पौधों के बेकार तनों या फिर जड़ों में नायाब कलाकृतिया ढूंढ लेने का अजब जुनून है। चलते फिरते उनकी पारखी नजरें पेड़ों के कटे तनों या फिर जड़ों में से ऐसी कलाकृतिया खोज लेती हैं, जिन्हें सुसज्जित कर वे अपने पास सहेज लेते हैं। अब तक वह पचास से अधिक ड्रिफ्ट वुड के कलेक्शन जुटा चुके हैं। इनमें से कई कलाकृतियाँ दोस्तों को भी बाट चुके हैं। बावजूद उसके उनका ड्राइंग रूम ऐसी कलाकृतियों से भरा पड़ा है। वहां और जगह नहीं है, उन्हें कहा रखें यह चिंता बढ़ती जा रही है। खास बात यह है कि इनमें कहीं भी ऊपर से तनिक भी कारीगरी नहीं है फिर भी ये जीवंत लगते हैं और हर कलाकृति कुछ न कुछ कहती हैं।
महानगर के मोहद्दीपुर मोहल्ले में रहने वाले जीपी मल्ल ने पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय से वर्ष-64 में प्लाट प्रोटेक्शन में बीएससी एजी आनर्स की परीक्षा पास की और इसके तत्काल बाद उनकी नौकरी चाय बागान में बतौर असिस्टेंट मैनेजर लग गई। अपनी मेहनत व लगन से वे कुछ ही दिनों में मैनेजर हो गए। एक बार किसी काम के सिलसिले में चंडीगढ़ जाना हुआ तो वहा उन्होंने एक एक पार्क में पेड़ पौधों की नेचुरल कलाकृतियों का कलेक्शन देखा। इनसे वह इतने प्रभावित हुए कि खुद भी ऐसे कलेक्शन जुटाने का शौक पाल लिया। असम में नौकरी के दौरान वर्ष-1967 में एक बार वह जंगल से गुजर रहे थे तभी एक तने पर उनकी नजर ठहर गई। गाड़ी रोक कर वह उतरे और पेड़ काट रहे मजदूरों से वह तना ले लिया। तने की शेप ऐसी थी कि हू-ब-हू घोड़े जैसा दिखता था। नीचे फाउंडेशन लगावाया और सहेज कर अपने ड्राइंग रूम में रख लिया। सन्-70 में असम के कार्बी आनलाग के जंगलों में उन्हें रबर प्लाट के एक पेड़ के मोटे तने पर लिपटी लताएं भा गई। पेड़ गिरा हुआ था और मजदूर उसे काट रेह थे। मल्ल ने मजदूरों से तने का वह हिस्सा जिस पर लताएं लिपटी थीं कटवा कर ले लिया। बताते हैं कि लताओं के बीच से बड़ी सावधानी से तना निकलवाया जिसके बाद यह कलाकृति मशहूर चित्रकार पिकासो के चित्र की तरह दिखने लगी। इसका भी फाउंडेशन बनवा कर उन्होंने ड्राइंग रूम में सजा लिया।
बताते हैं कि साथ काम करने वाले उनके अंग्रेज साथी इस कलाकृति की प्रशसा करते नहीं अघाते थे। इसे तैयार करने में दो हफ्ते का समय लगा था। इसी प्रकार वर्ष-73 में वह प। बंगाल में जलपाईगुड़ी के जंगलों से सिरिस के पेड़ से ऐसी जड़ लाए जो अमेरिका के राष्ट्रीय पक्षी बॉल्ड ईगल की शेप की है। इसे दीमक ने ऐसा चाटा था कि पक्षी के खुरदुरे पंख व बिना बाल वाले सिर में ठोड़ तक उभर आए थे। इस पर मिट्टी की पर्त जमी थी। उसे साफ कराने में काफी वक्त लगा। इसी प्रकार उन्होंने चाय की डाली का कुत्ता, आठ टाग वाली मकड़ी [टैरंडुला], बाघ, कछुआ, भैंसे का सिर व सींग, अलग-अलग जानवरों की सींग असम के डुआर्स, कार्बी आनलाग तथा दार्जिलिंग व सिलीगुड़ी से जुटाई। घर में मेज भी चाय के तने वाले हैं। वर्ष-83 में नौकरी छोड़ कर गोरखपुर घर आ गए। तब भी उनका यह शौक जारी रहा और ऐसी कलाकृतिया जुटाते रहे। पत्नी संध्या मल्ल भी इस शौक में उनका भरपूर साथ देती रहीं। अंतिम कलाकृति गोरखपुर के बहरामपुर के पास एक अमरूद के तने से वर्ष-1988 में हासिल की जो कंगारू की शेप में है। 68 वर्षीय मल्ल ने बताया कि वे शौकिया तौर पर ही ऐसा करते थे। कब यह जुनून बन गया पता नहीं चला। ड्रिफ्ट वुड की करीब 50 से अधिक कलाकृतिया उन्होंने सहेजीं। जिनमें से कई उन्होंने लोगों को बाट दीं, क्योंकि उन्हें कहा रखें यह चिंता बढ़ती जा रही थी। ड्रिफ्ट वुड लकड़ी की ऐसी कलाकृतियों को कहते हैं जो प्राकृतिक रूप से पेड़ पौधों में खुद उभर आती हैं।

मिथिलेश द्विवेदी जी से साभार