शुक्रवार, 2 मई 2014

युवा कलाकार या Premature Delivery.

 वरिष्ठों का अन्याय
मूमल नेटवर्क, जयपुर। अच्छी और बेहतर कलाकृतियों की प्रदर्शनी के संबंध में तो हमेशा ही लिखा जाता है और उनकी विशेषताओं को कला के जानकार भले ही मुखर होकर बोलने से कतराते हैं, लेकिन मन ही मन सराहते भी हैं। जब कि इस मामले में उदयीमान युवा कलाकारों के साथ बहुत अन्याय हो रहा है। उनके काम को यही जानकार बिना वजह मुखर होकर सराहते हैं और इसे प्रोत्साहन कहते हैं। जबकि अनेक युवा कलाकारों का काम अन्य कलाकारों की अधकचरी नकल भर होता है। ऐसे युवा कलाकारों के साथ इसे सीनियर्स द्वारा किया जाने वाला अन्याय कहा जाना चाहिए।
युवा कलाकार के काम 
प्री मेच्योर डिलीवरी सा
अपूर्ण साधना और अपरिपक्व कूंची के साथ प्री मेच्योर डिलीवरी सी आर्ट एग्जीबिशंस का सिलसिला पिछले कुछ अर्से से एकाएक बढऩे लगा है। पिछले दिनों जयपुर के जवाहर कला केंद्र की एक कला दीर्घा में एक और ऐसी प्रदर्शनी देखने को मिली जिसे देख मन विषाद से भर गया। इस युवा कलाकार की पहली प्रदर्शनी थी और इसमें कुल 22 काम प्रदर्शित किए गए थे। पूरी प्रदर्शनी पर किसी व्यवसायिक आयोजन की छाया थी। प्रदर्शनी की प्रचार सामग्री भी उसी के अनुरूप थी। कला दीर्घा को गुलाब और गैंदे के फूलों से सजाने के नाम पर एक कोने से दूसरे कोने तक फूलों से पाट दिया गया था। एक बड़ी सी गोल मेल पर बिसलरी की क्वाटर बोट्लस के साथ चॉकलेट व टाफी के साथ तरह-तरह के कुकीज सजाए गए थे। इन सब के साथ सजे बैठे युवा कलाकार के साथ मौजूद थे उसके अभिभावक। ...और इन सब के बीच बेतरतीब ठंग से लगाए गए युवा कलाकार के वह सभी काम जो उसने अपनी शिक्षा अवधि में अभ्यास के दौरान बनाए होंगे।
भौंडा प्रदर्शन व तामझाम
पता नहीं इस प्रदर्शनी के प्रस्तुति पक्ष पर किस जानकार सलाहकार की सेवाएं ली गई, लेकिन यह स्पस्ट दिख रहा था कि सलाहकार जी को दिखावे के तामझाम की जानकारी तो है, लेकिन कलाकृतियों की प्रस्तुति के बारे में वे कुछ नहीं जानते वरना कलाकृतियों के लिए चुने गए स्थान और उनकों दर्शक की आई लेवल पर रखने का जरूरी पक्ष नजरअंदाज नहीं होता। खैर! कलाकृति दर्शनीय हो तो कला प्रेमी उसे कुछ ऊंचा-नीचा होकर भी देख सकता है और वह किसी भी स्थान पर हो उसे देखता ही है। यहां हम चित्रकारी की बात करें तो अध्ययन काल के काम तो अपरिपक्व ही होंगे यह बात समझ में आती है, लेकिन यह समझ में नहीं आता कि उनका अदर्शनीय होने के बावजूद उनका सार्वजनिक प्रदर्शन प्रदर्शन क्यों? केवल कला दीर्घा की दीवार के खाली लग रहे स्थान को भरने भर के लिए कुछ भी लगा देना क्या कला प्रशंसकों का अपमान नहीं?
नकल और केवल नकल
कुछ बिरला प्रतिभाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश कला विद्यार्थियों के अध्ययन काल में बनाए चित्र किसी न किसी स्थापित या महान कलाकार की कृतियों से ही प्रभावित होते हैं। जाहिर है, इस युवा कलाकार के काम में भी वही सब था। अब अन्य चित्रों की बात करें तो वह भी नकल, बल्कि कहा जा सकता है लगभग हूबहू नकल। ...और नकल भी किसकी किसी बड़े, महान या स्थापित कलाकार के काम की नहीं, बल्कि पूरी तरह कॉमर्शियल उन पोस्टर कलाकारों की जिनके काम कम्प्यूटर्स के वॉलपेपर के लिए उपयोग किए जाते हैं। यह वाल पेपर्स भी वे जो गूगल इमेज पर 'कलरफुल पेंटिंग्स' टाइप करते ही धड़ाधड़ मॉनीटर पर प्रकट हो जाते हैं।
गूगल इमेज पर 'कलरफुल पेंटिंग्स' -1

गूगल इमेज पर 'कलरफुल पेंटिंग्स' -2

गूगल इमेज पर 'कलरफुल पेंटिंग्स' -3
प्रोत्साहन या पतन
इस पर तुर्रा यह कि इस काम की कलाकार के आसपास मंडराने वाले सभी लोग तारीफ करते करते नहीं थकते। चलो अभिभावक के लिए तो उनकी संतान ही सबसे होनहार हो सकती है, परिजन और अभिभावकों के सोशल सर्कल में शामिल लोग भी किसी न किसी मजबूरी या कला क्षेत्र की कम जानकारी के चलते ऐसा करते हैं, दैनिक समाचार पत्रों के पुलआउट और लोकल टीवी चैनल्स के व्यस्त रिपोटर्स को भी दोष नहीं दिया जाना चाहिए, क्यों की इनमें से अधिकांश का विषय कला नहीं होता और युवा कलाकार का उत्थान या विकास इनका विषय या लक्ष्य भी नहीं होता। इन्हें तो बस हर खबर में रंग जमाना होता है, माना कि इनकी भी कई मजबूरियां हैं, लेकिन उन कला जानकारों का क्या जो सब जानते हुए भी युवा कलाकार की मिथ्या सराहना करते हैं। एक और वे कहते हैं युवाओं को कड़ी साधना और अथक अभ्यास करना चाहिए। मौलिकता पर भी यही जानकार कला गोष्ठियों के व्याख्यान में सार्वजनिक रूप से ज्ञान वितरित करते हैं, जबकि युवा कलाकार और उसके परिजनों के मुंह पर उसके अधकचरे काम की सराहना करते हैं और इसे प्रोत्साहन देने और हतोत्साहित नहीं करने की मंशा के लबादे से ढक देते हैं।
इतने क्रूर और कठोर क्यों ?
मिथ्या सराहना करने वाले कला के सहृदय जानकार और वरिष्ठ कलाकार उदयीमान युवा कलाकारों के प्रति इतने कू्रर और कठोर क्यों हो जाते हैं? किसी युवा कलाकार की भू्रण हत्या होते देखकर भी उन्हें रहम क्यों नहीं आता? कोई तो हो जो नवांकुरों की जड़ों में तेजाब डालने से साफ इंकार करे, कोई तो हो जो इन नई पौध पर मट्ढा डालने का विरोध करे....। -गायत्री 

मूमल मीमांसा 
अधबुने सपने और कला मृत्यु के पथ 
यह सही है कि जयपुर में कला गतिविधियां बढ़ी हैं। जवाहर कला केन्द्र की दीर्घाएं कला प्रदर्शन से आबाद रहने लगी हैं। अलग-अलग जगहों से आए आर्टिस्ट्स के साथ शहर के कलाकारों के फन से भी रूबरू होने के अवसर बढ़े हैं। कला के विभिन्न रूपाकारों के बीच घूमते हुए कई बार कुछ ऐसे प्रदर्शन भी देखने को मिलते हैं, जिनके माने ही समझ में नहीं आते।
साधना रहित खींंची हुई रेखाएं या फिर किसी स्थापित कलाकार की कृतियों की नकल या फिर दोनों का संगम। यह सब देखकर कला के प्रति आसक्त मन उदास हो जाता है, रोष से भर जाता है। ऊपर से कोढ़ पर खाज का काम करता है, अपरिपक्व पत्रकारों द्वारा ऐसी कला पर शब्दों के लम्बे-चौड़े मकड़-जाल से किया गया महिमा मंडन। किसी अखबार में छपना, वाहवाही हासिल करना और अपनी अपूर्णता को पूर्ण मानकर गर्व करना। ऐसी वृति को पालने वाले कलाकारों की संख्या में बीते दिनों अच्छी-खासी वृद्धि हुई है।
शौकिया कक्षाओं में कुछ समय तक अधकचरा ज्ञान प्राप्त करने वाले लोग या फिर कला में अध्ययनरत छात्र समय से पूर्व ही अपनी कला का प्रर्दशन करने का लोभ नहीं संवार पाते। रातो रात प्रसिद्धि का आकाश छूने का सपना पाल जरूरी कला साधना से पहले ही दीर्घाओं की दीवारों पर अपने अधबुने सपने को टांग कला मृत्यु के पथ पर चल देते हैं। अफसोस की झूठी वाहवाही के चलते समय रहते उन्हें वास्तविक्ता का भान भी नहीं हो पाता है।
पहले अपरिपक्व प्रदर्शन और फिर हवाई प्रकाशन, समय से पहले की परवाज चाहने वाले उनके सपनों को हवा देने लगते हैं। और उनके आगे बढऩे की अपार क्षमताओं की संभावनाएं इस लालसा के आगे टूट जाती हैं, क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। झूठी प्रशंसा से खिंची भ्रम की दीवार उस पार के सच को देखने नहीं देती। कुछ समय बाद जब भ्रम की दीवार टूटती है, तब तक हौसले पस्त हो चुके होते हैं। दिलोदिमाग कुण्ठा से भर चुका होता है। और सामने होती है, गहरी टूटन लिए अधूरी साधना।

मंगलवार, 11 मार्च 2014

इटली की डेनिएला का भारत को शुक्रिया


जयपुर के जेकेके में 12 से चित्र प्रदर्शनी

मूमल नेटवर्क,जयपुर। इटली के मिलान शहर की कलाकार डेनिएला कट्टानेओ की भारत भ्रमण के दौरान बनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी 12 मार्च की शाम जयपुर के जवाहर कला केंद्र में शुरू होगी।
इटली से निकलकर दुनियां के विभिन्न हिस्सों से होकर भारत आने के बाद डेनिएला की विचलित कला को जिस ठहराव का अहसास हुआ वह इनके काम में स्पस्ट नजर आ रहा है। खासकर राजस्थान के राज महलों से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों तक का जनजीवन उन्होंने कागज पर जलरंगों से उकेरा और फिर मरुभूमि की ठेठ ग्रामीण कसीदाकारी से जोड़कर अपने भाव व्यक्त कर दिए। डेनिएला की सभी कृतियों में कमोबेश महिलाओं और बच्चों के प्रति उनका अनुराग झलकता है। वे कहती हैं कि बात चाहे इटली की हो या भारत की कुल मिलाकर सोच एक ही है। इसके लिए वे ककविगुरू रवीन्द्रनाथ टैगौर की उस बांग्ला कविता की पंक्तियों को आत्मसात किए हुए हैं जिनका भावार्थ है कि 'भले ही हमारे बीच एक नदी बह रही है, लेकिन इसके दोनों किनारों पर गूंज रहे गीत समान हैं।'
हालांकि डेनिएला ने अपने आर्ट शो को 'एनकांउटर्स' ए ट्रिब्यूट टू इंडिया नाम दिया है, लेकिन यहां एनकाउंटर का अर्थ 'मुठभेड़' न होकर इसका बहुत ही कोमल आशय है...सामना या साक्षात्कार। डेनिएला ने इस साक्षात्कार के लिए भारत को अपनी कूंची से 'शुक्रिया' कहने का भरपूर प्रयास किया है। वैसे भी डेनिएला को हिन्दी के केवल दो ही शब्द आते हैं, शुक्रिया और नमस्ते।
डेनिएला की कलाकृतियों की प्रदर्शनी का उद्धाटन शाम 6 बजे जवाहर कला केंद्र के महानिदेशक उमराव सालोदिया करेंगे। यह प्रदर्शनी 15 मार्च तक देखी जा सकती है।

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

शेखावाटी हवेलियों के चित्रों पर कंपनी शैली का प्रभाव


शेखावाटी हवेलियों के चित्रों पर ढूँढारी व कम्पनी चित्रकला का प्रभाव
यह लेख लेखिका डॉ. कनुप्रिया कुमावत के शोधपत्र कुमावत कलाकारों का योगदान व चेजारा चितेरों द्वारा शेखावाटी के हवेलियों के चित्र व चित्राकनों पर अंग्रेजों का प्रभाव से लिए गए कुछ अंश है। लेखिका ने यह शोधपत्र राजस्थान स्कूल आफ आर्ट की तरफ से कनोडिया कॉलेज में 
31 जनवरी से 3 फरवरी तक हुए सेमीनार में पढ़ा था।

 ढूँढारी चित्रकला का अनुकरण ठिकानों में भी हुआ है। ईसरदा, सिवाड़, झिलाय, चौमू, मालपुरा, सामोद में भी कलाकारों ने भित्ति चित्रण किये। इनका प्रभाव हमको शेखावाटी क्षेत्र के हवेलियों में भी स्पष्ट नजर आता है। यूं तो शेखावाटी अपने को जयपुर से स्वतंत्र मानकर चलता था, पर चित्राकन के विषय में वह जयपुर से बेहद प्रभावित नजर आता है। 1947 तक शेखावाटी जयपुर की रियासत का एक हिस्सा था । शेखावाटी में अधिकतर हवेलियों का निर्माण 19 वीं शताब्दी के मध्य ओर उत्तराद्र्ध में किया गया था।
शेखावाटी के चेजारा कुमावतों ने हवेलियों के निर्माण व चित्रकारी के काम की छाप ऐसी छोड़ी, जो आज भी देखने लायक है । शेखावाटी के अधिकांश भित्ति चित्र लगभग 125 से 150 वर्ष पूर्व के बने हैं। हवेलियों में अराइस की आलागीला पद्धती और दीवार की सूखी सतह पर भी चित्राकंन मिलते है। अराइस क ी गीली सतह के चित्रो में स्केच (कुराइ) तकनीक का सुन्दर प्रयोग किया है। अन्दर का हिस्सा आज भी सुरक्षित व सजीव है।
चित्रो के विषय में - रामायण , महाभारत, कृष्ण लीला, शिवपार्वती, ढोलामारू को लिया गया है। रगों में नीला (देशी नील), हरा (हरा पत्थर , सीलू), लाल (गेरू व सिंगरफ) जैसी प्राकृतिकरगों का प्रयोग किया गया है।   इन चित्रों का निर्माण 19 वीं शताब्दी के मध्य या उत्तराद्र्ध में होने के कारण इन पर यूरोपीय प्रभाव भी अधिक रहा है। शेखावाटी के सेठ कलकत्ता में रहकर यूरोपीय जीवन से भली भांती परिचित हो गये थे। इन्होने यहां अपनी हवेलियां बनाई और उन्हें चित्रों से सुसज्जित किया। जैसे लक्ष्मणगढ में झुन्झुनू वालों की हवेली, मुकुन्दगढ में नागलियो की हवेली, झुन्झुनू में टीबड़े वालों की हवेली, ईसरदास मोदी की हवेली, चूड़ी अजीतगढ में नेमाणियों की हवेली, चुरू में कोठारीयों की हवेली इसके अतिरिक्त - सीकर, नवलगढ, मण्डावा, फ तेहपुर, रामगढ, लक्षमणगढ, रानोली, वैध की ढाणी, सीकर, खाटूश्याम जी में भी कई हवेलियां है।
 शेखावाटी क्षेत्र में हमें धार्मिक चित्र, सामंती, श्रगांरिक चित्र, लोकजीवन पर चित्र और कंपनी शैली के समिश्रित चित्र देखने क ो मिलते हैं । सीकर मे मिले धार्मिक चित्रों में रामकृष्ण लिलाऐं, रामगढ की हवेली मे ब्रम्हा जी का चित्र जिसमे दाढी मूंछे हैं। सेठों की हवेली मे लोकजीवन, दरबारी चिंत्राकन , गांवों व कस्बो का चित्र, ऊॅ ट, हाथी, घोड़े, भाले, तीर-तलवार व शस्त्र तो कहीं झूला झूलती स्त्रीयां भी हैं।
इन हवेलियों में अंग्रेजों के प्रभाव का गहराई से अवलोकन करें तो सीकर के ठिकानेदार माधवसिंह ने 20 जून 1897 विक्टोरिया जुबली हॉल बनवाया। यहां के अभिलेख कहतें है कि विक्टोरिया के शासन के 60 साल पूरे होने के उपलक्ष्य मे यह हॉल बनवाया गया था। सेठ साहूकारों ने उदारतापूर्वक कलाकारों व चित्रकारों को आश्रय देकर कला को जीवित रखने व विकसित करने में अपना योगदान दिया।
शेखावाटी क्षेत्र में अधिकंाशत ढूँढारी और कंपनी दोनो ही शैली का चित्रण हुआ है।
यहां रेल का प्रचलन पहली  बार 1916 में हुआ। लेकिन 1865 व 1899 में बने दो भित्ति चित्रों में रेल का चिंत्राकन किया गया हैं। 1865में रामगढ में रामगोपाल पोदर की हवेली में काले रगं का ईंजन व लाल रंग के डब्बों को चित्रित किया गया। ड्राइवर व खलासी अंग्रेजी वेशभूषा मे हैं । सर पर टोप पहने हैं। पहिए बड़े आकार के, मुसाफि र अलग-अलग वेशभूषा में दिखलाए गयें है।

नीम का थाना में शिव नारायण प्रसाद पटवारी की हवेली में रेलगाड़ी का चित्र 1899 का हैं। रामगढ की पोद्दार की हवेली में इग्लण्ै ड की महारानी मैरी और जॉर्ज पचंम के आगमन के चित्र हंै। चार पहियों वाली व दो पहियों की गाडी़ के चित्र, 1890 में लक्षमणगढ के बद्रीदास वैद्य की हवेली के भित्ति चित्रो में अग्रेजी वेशभूषा पहने साईकिल सवार, 1890 में मंडावा में हवाई जहाज का चित्र, 1900 में नागरमल सेठ की नेमानी की हवेली मे कार के चित्र मिलते हैं।
 शेखावाटी के चितेरे
भित्ति चित्रण की इस समृद्धशाली परम्परा मे चित्रकारों का नाम और समाज में एक स्थान था। वे कोई गुमनाम चितेरे नहीं थे। इनमे नवलगढ के चितेरे- स्व. प्रताप जी बेडवाल, स्व.लादूराम जी बबेरवाल, स्व.मांगीलाल जी घोड़ेला। मण्डावा के चितेरे स्व.मुरलीधर जी तोंदवाल, स्व.हनुमान जी सिरसवा, फ तेहपुर व रामगढ के चितेरे स्व.राधेश्याम तूनवाल, स्व.आशाराम जी तूनवाल थे। इसके साथ रामलाल कुमावत, मूलचन्द कुमावत, गजानन्द तूनवाल इत्यादि चित्रकारों के नाम भी शामिल हैं। यह सही है कि राज्याश्रय मे रहते हुऐ इन चित्रकारों का लिखित में कहीं उल्लेख नहीं है फिर भी विभिन्न साक्ष्यों से उनके नाम प्राप्त हो जाते हैं।
                                            -डॉ. कनुप्रिया कुमावत
अब अपनों से अपनी बात 
पाठक ही बताएं..
पिछले दिनों कला विद्यार्थी पाठकों की यह मांग जाहिर हुई है कि 'मूमल' में ताजा समाचारों और कला जगत की गतिविधियों के साथ शैक्षिक पक्ष को भी बढ़ाया जाए। इसके लिए प्रत्येक अंक में किसी न किसी नए या पुराने कलाकार के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाए।
इसके बाद मूमल के संपादक मंडल ने तय किया है कि वर्तमान में उपलब्ध लिमिटेड प्रिंट एरिया में उतने विस्तार से जानकारी संभव नहीं है जितनी विद्यार्थी चाह रहे हैं। इसके लिए कुछ विशेष संस्करण प्रकाशित करने होंगे। इसके बाद उन कलाकारों का चयन भी आसान नहीं जिनके बारे में आप जानकारी चाहते हैं।
ऐसे में अब आप ही बताएं कि आप नए या पुराने किन-किन कलाकारों और कला विधाओं के बारे में जानना चाहते हैं? आप की राय व आवश्यता जानने के बाद ही मूमल संबंधित विषय विशेषज्ञों से सामग्री तैयार कराके आगामी अंकों में इसे प्रकाशित करेगी।
आप अपनी राय हमें एस.एम.एस., ई-मेल या पत्र के जरिए दे सकते हैं। मूमल के ब्लॉग, फेसबुक या ट्वीटर पर इस बारे में कमेंट भी किया जा सकता है। हमें आपकी राय का इंतजार है, क्योकि मूमल पाठकों से संचालित होता है... बाजार से नहीं।
-संपादक
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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

Asian Art Show एशियन आर्ट शो


एशियन आर्ट शो में जयपुर के 
विद्यासागर उपाध्याय एवं विनय शर्मा 
के चित्र प्रदर्शित

दिल्ली के आईफैक्स कला दीर्घाओं में आरम्भ हुए एशियन
आर्ट शो में जयपुर के वरिष्ठ चित्रकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय एवं
विनय शर्मा की कृतियाँ दर्शको को आकर्षित कर रही है । दिनांक 17
फरवरी को कोरियन कल्चर सेन्टर, नई दिल्ली के निदेशक किम कुंम
प्योंग ने प्रदर्शनी का उद्घाटन किया ।

कोरिया की प्रसिद्ध कला पत्रिका “मैगजीन आर्ट “ द्वारा कोरियन कल्चर
सेन्टर के सहयोग से आयोजित इस प्रदर्शनी में कोरिया, भारत, चीन एवं
बंगला देश के कलाकार भाग ले रहे है । 100 कलाकारों के चित्रों
की प्रदर्शनी में भारत के 14 कलाकार, कोरिया के 80, बंगलादेश के
4 एवं चीन के दो कलाकारों को आंमत्रित किया गया है । यह प्रदर्शनी
दिसम्बर में साऊथ कोरिया के डे जोन शहर में होने वाले
इन्टरनेशनल आर्ट फेयर में लगाई जायेगी ।

डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के एक्रेलिक माध्यम से बने कैनवास पर रंगांे
की सिम्फनी को रोचक तरीके से दर्शाया है । रंगों की फ्रीडम का
अहसास उनके चित्रों में देखने को मिलती है । प्रफुल्लित रंग मानो
कैनवस पर कोई राग सुना रहे हों ।
वहीं विनय शर्मा अपनी चिर परिचित शैली में भाषा की दरखत
कैनवास पर उतार समृद्ध भारतीय साहित्य की बानगी कैनवास पर दर्शाई है ।
पुराने हस्तलिखित खतों को कैनवस पर हल्के गहरे रंगांे से उकेर गुजरे
समय की स्मृतिों को दर्शाया है ।
विनय शर्मा के चित्र कोरिया में प्रदर्शित
दिनांक 18 फरवरी से 27 फरवरी तक इण्डियन कल्चर सेन्टर सियोल -
साऊथ कोरिया में जयपुर के विनय शर्मा के चित्र प्रदर्शित किये जा रहे है ।
इस प्रदर्शनी में कुल बीस कलाकारों की कृतियाँ दिखाई जा रही है
इनमें 9 भारतीय एवं 11 कोरियन कलाकार है ।

कोरिया इण्डिया कन्टम्परेरी आर्टिस्ट एसोसियेशन के सहयोग से आयोजित इस प्रदर्शनी मंे विनय शर्मा ने विशेष रूप से तैयार किये हैण्डमेड पेपर पर पुराने हस्तलिखित हैण्डमेड को पारदर्शिता से दिखाया है । विनय अपने पेपर का निर्णय स्वयं करते है एवं परत-दर-परत उसमंे पारदर्शिता दिखाते हैं । एैसा प्रतीत होता है मानो अक्षर झरोखों से देख रहे हो । पुरानी भारतीय जीवन पद्धति के साक्षी बनते विनय शर्मा के चित्र दर्शकों को अपनी और आकर्षित करते है । ऐसा प्रतीत होता है मानो गुजरे समय को वे अपने चित्रों में समेटना चाहते हों ।

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

राजस्थान स्कूल आफ आर्ट की राष्ट्रीय कला कार्यशाला शुरू


कृतिकार और दर्शक को मैं से हम होना होगा -सालोदिया
मूमल नेटवर्क, जयपुर। कलाकार और उसकी कृति का दर्शक 'मैं' से निकल कर 'हम' हो जाए और फिर हम मिलकर अपने अनुभव साझा करें तब ही कलाकृतियों का सृजन, प्रदर्शन व दर्शन सार्थक हो सकता होगा। यह लब्बोलुआब उस उद्बोधन का है जो आज प्रदेश के सबसे पुराने कला शिक्षा संस्थान राजस्थान स्कूल आफ आर्ट द्वारा आयोजित तीसरी राष्ट्रीय कला कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी व जवाहर कला केन्द्र के महानिदेशक उमराव सालोदिया ने व्यक्त किए।
राष्ट्रीय कला कार्यशाला के मुख्य अतिथि के रूप में उमराव सालोदिया ने कहा कि किसी कलाकृति के पीछे की भावना सिर्फ  एक कलाकार ही बेहतर व्यक्त सकता है, लेकिन आम दर्शक भी उससे जुड़कर उसे देख और समझ सके, ऐसा तभी सम्भव है जब वह 'मैं' से निकल कर 'हम' हो जाए और फिर हम आपस में अपने-अपने अनुभव साझा करें व कलाकृतियों का सृजन व प्रदर्शन सार्थक करें।
कॉजेल परिसर में चल रही राष्ट्रीय कला कार्यशाला का आयोजन 6 फरवरी तक होगा। इसमें देशभर के विभिन्न महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की ललित कला संकाय के चित्रकला एवं व्यावहारिक कला विभाग में अध्ययनरत कुल 50 विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। कार्यशाला का संचालन वरिष्ठ कलाकार व कॉलेज के एप्लाइड आर्ट विभाग के प्रमुख सुनीत घिल्डियाल द्वारा किया जा रहा है।
घिल्डियाल ने 'मूमल' को बताया कि इस कार्यशाला का मूल उद्देश्य देश भर से आये विभिन्न ललित कला महाविद्यालयों एवं राजस्थान के विद्यार्थियों के मध्य वैचारिक तथा कला एवं संस्कृति का आदान - प्रदान करना भी है। कार्यशाला में विद्यार्थी विभिन्न विधाओं में कार्य करेंगे। इस कार्यशाला में बड़़ोदा, दिल्ली, लखनऊ, बनारस,  चंडीगढ़ जैसे 11 प्रतिष्ठित महाविद्यालयों से विद्यार्थी भाग ले रहे हैं।
इस कार्यशाला के लिए राजस्थान स्कूल ऑफ़ आर्ट, जयपुर के विद्यार्थियों ने महाविद्यालय परिसर के मध्य में एक विशाल हैंगिंग इंस्टालेशन (संस्थापन) किया है जो बहुत ही सुन्दर व दर्शनीय है , जिसका निर्देशन जयन्तश्री द्वारा किया गया है।
इससे पूर्व राजस्थान स्कूल ऑफ़ आर्ट की प्राचार्या डॉ. वंदना चक्रवर्ती ने मुख्य अतिथि उमराव सालोदिया का स्वागत कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। तत्पश्चात कला इतिहास विभाग क प्रमुख हरिशंकर ने कार्यक्रम का विवरण दिया।
अंत में कार्यशाल कन्वीनर सुनीत घिल्डियाल ने सभी उपस्थित जनों का आभार व्यक्त करते हुए मुख्य अतिथि के संबोधन से सहमति व्यक्त की और कहा कि हमेशा संवाद ही नए आयामों को जन्म देता है। उन्होंने बताया कि यह कार्यशाला बहुत यादगार होगी, क्योंकि इस ऐतिहासिक इमारत में इस कला महाविद्यालय की सम्भवत: यह अंतिम कार्यशाला है। इसके बाद कॉलेज शिक्षा संकुल स्थित नए भवन में स्थानान्तरित हो जाएगा।

 

बुधवार, 15 जनवरी 2014

कला मेले में कई कलाकारों का नया काम

मूमल नेटवर्क, जयपुर। राजस्थान ललित कला अकादमी के वार्षिक कला मेले में प्रदर्शन के लिए इस बार अनेक कलाकारों ने रात-दिन एक करके नई कलाकृतियां तैयार की हैं। इनमें से कुछ की जानकारी मूमल तक पहुंची है। इनमेंं वरिष्ठ कलाकार डा. रीता पाण्डे, श्वेत गोयल और डा. मणि भारतीय शामिल हैं।

सामान्यतह वर्ष में केवल एक बार अपना काम प्रदर्शित करने वाली डा. रीता पाण्डे ने इस बार अपनी नाइफ पेंटिंग्स में प्राकृतिक दृश्यों को बखूबी उकेरा है। प्रदेश में नाइफ पंटिंग्स जैसे कठिन माध्यम से काम करने वाली वे एक मात्र वरिष्ठ कलाकार हैं। इस बार कला मेले में वे अपने आधा दर्जन से अधिक नई कृतियों के साथ उपस्थित होंगी।

पेपर कोलाज केजरिए प्रकृति के भाव व्यक्त करने वाली डा. मणि भारतीय ने इस बार समुद्र के शांत और रौद्र दोनों रूपों को संजोया है, वहीं पहाड़ों के गंभीर फैलाव को भी कुशलता से कतरनों में कसा है। रंगों की छटा से अमूर्त को दर्शाने में माहिर श्वेत गोयल ने अब अपनी कलाकृतियों में हल्के आकार उभार कर नया जादू जगाने का प्रयास किया है। जबकि शीतल चितलांगिया की कृतियों में मनमोहक आकार के साथ रिक्त में रचेे गए भावों की रेल-पेल नजर आएगी।

भीलवाड़ा के प्रतीक कुमावत अपनी पुरस्कृत कृतियों 'जीवन संगनीÓ व 'इजिप्सियनÓ के साथ नजर आएंगे। विश्वविद्यालय के विद्यार्थी राहुल उषावरा हाल ही तैयार एक सीरीज की दो पेंटिंग्स प्रदर्शित करेंगे, लेकिन पिछले दिनों राजस्थान ललित कला अकादमी से पुरस्कृत राहुल की कृति कला मेले में नहीं देखी जा सकेगी।

रविवार, 5 जनवरी 2014

माँ बनाती थी रोटी

माँ बनाती थी रोटी 
पहली गाय की , 
आखरी कुत्ते की
एक बामणी दादी की
एक मेथरानी बाई की
हर सुबह सांड आ जाता था
दरवाज़े पर गुड़ की डली के लिए
कबूतर का चुग्गा
किडियो का आटा
ग्यारस, अमावस, पूर्णिमा का सीधा
डाकौत का तेल
काली कुतिया के ब्याने पर तेल गुड़ का सीरा

सब कुछ निकल आता था
उस घर से , जिसमें विलासिता के नाम पर एक टेबल पंखा था

आज सामान से भरे घर में
कुछ भी नहीं निकलता
सिवाय कर्कश आवाजों के