मंगलवार, 20 मई 2014

Moomal, Question Answer, प्रश्नात्तररी,


यह ऐसे प्रश्न हैं जो यूजीसी द्वारा व्याख्याता पात्रता टेस्ट, विभिन्न आर्टस कॉलेज में टेस्ट के द्वारा प्रवेश प्रकिया के तहत नेट Net व Set  की परीक्षा में व शोधार्थी के एडमीशन हेतु पात्रता टेस्ट के तहत सामान्य ज्ञान के प्रश्नों के अन्तर्गत पूछे जा सकते हैं।
प्रश्नात्तररी-26
प्रश्न 1. जयपुर स्थित संग्राहलय अल्बर्ट हॉल का उद्घाटन किसके शासनकाल में हुआ था?
प्रश्न 2. अकबर कालीन चित्रित 'रज्जनामा' की प्रतिकृति कौनसे संग्रहालय में चित्रित की गई थी?
प्रश्न 3. सोने की प्लेटों से सुसज्जित छत और एक ही पत्थर को तराश कर बनाई गई 14 मूर्तियां किस पुस्तकालय में हैं?
प्रश्न 4. सोमपुरा शिल्पी राजस्थान के किस इलाके में निवास करते हैं?
प्रश्न 5. टोंक स्थित कलात्मक बीसलपुर शिव मंदिर का निमार्णकाल कौनसा है?
प्रश्न 6. फड़ चित्रों में चित्रित कथा को गाकर संनाने वाले कलाकारों को किस नाम से पुकारा जाता है?
प्रश्न 7. कौनसी फड़ दिन के समय गाई जाती है?
प्रश्न 8. रात को गाई जाने वाली फड़ के नाम?
प्रश्न 9. सन् 1992 में भारत सरकार द्वारा फड़ चित्रण पर जारी डाक टिकट में किस नायक की आकृति चित्रित है?
प्रश्न 10. राजस्थानी चित्रकला का चरम् काल कौनसा माना गया है?
प्रश्न 11. मेवाड़ स्कूल का स्वर्णयुग किसके शासनकाल को माना गया है?
प्रश्न 12. गीतगोविन्द की प्राचीन सचित्र प्रति 'गीतगोविन्द आख्यिका' का चित्रांकन कब व कहां हुआ?
प्रश्न 13. गीतगोविन्द की सवार्धिक चर्चित और प्रसिद्ध सचित्र प्रति किस संग्रहालय में संग्रहित है?
प्रश्न 14. चावंड शैली का उद्गम स्थल कौनसा है?
प्रश्न 15. 'चितारों की ओवरी' नाम से मेवाड़ में कल विद्यालय की शुरुआत किस राजा ने की?
प्रश्न 16. 'चितारों की ओवरी' को दूसरे किस नाम से पुकारा जाता था?
प्रश्न 17. राजकीय संग्रहालय उदयपुर में 'गीतगोविन्द' पर आधारित कुल कितने लघुचित्र संग्रहित हैं?
प्रश्न 18. जयपुर की मोतीडूंगरी की तलहटी में स्थित गणेश मंदिर की प्रतिमा कब व कहां से लाई गई थी?
प्रश्न 19. कलाविद पं. द्वारका प्रसाद शर्मा जी का जन्म कब व कहां हुआ था?
प्रश्न 20. कलाविद पं. द्वारका प्रसाद शर्मा जी ने राजस्थान सरकार के चीफ आर्टिस्ट पद का भार कब संभाला था?
उत्तर
1. महाराजा माधोसिंह द्वितिय के।
2. अल्बर्ट म्यूजियम हॉल में।
3. रजा पुस्तकालय, रामपुर, उ.प्र.।
4. डंगरपुर व बांसवाड़ा।
5. वि.सं. 1244(ई. सन् 1187)
6. भोपा-भोपी।
7. रामदलस व कृष्णदला।
8. देवनारायण, पाबूजी व रामदेवजी।
9. देवनारायण जी की।
10. 17-18वीं शती।
11. महाराणा कुम्भा के।
12. गोगुन्दा में 1445 ई. के आस-पास।
13. प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम, मुबई में।
14. तत्कालीन मेवाड़ की राजधानी चावंड।
15. महाराणा जगतसिंह प्रथम ने।
16. तस्वीरों रो कारखानो।
17. 224
18. मावली से सन् 1761 में।
19. सन् 1922 बीकानेर में.
20. सन् 1972 में।

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शनिवार, 17 मई 2014

Art आर्ट की ऑनलाइन मार्केटिंग


मूमल नेटवर्क, जयपुर। ऑनलाइन मार्केट के बढ़ते रूझान को देखते हुए अब आर्टिस्ट भी अपनी पेंटिंग्स को ऑनलाइन प्रमोट करने लगे हैं।
इनमें पेंटिंग्स से लेकर आर्ट डेकोरेटिव पीस भी शामिल हैं। आर्टवर्क के लिए इंडियन के साथ फॉरेन शॉपिंग वेबसाइट्स भी शामिल हो गई हैं।
ज्यादातर वेबसाइट्स कस्टमाइज्ड 
आर्टवर्क को प्रमोट करने वाली ज्यादातर वेबसाइट्स कस्टमाइज्ड हैं। इनसे सिर्फ  पेंटिंग्स ही खरीदी जा सकती हैं। वेबसाइट्स को इस तरह तैयार किया गया है कि उसमें हर एक पेंटिंग्स की डिजाइन से लेकर उसके प्रकार को विस्तार से बताया जाता है। दूसरी ओर, आर्टिस्ट भी आसानी से इसमें अपनी पेंटिंग को अपलोड कर सकते हैं।
एग्जीबिशन के लिए ऑनलाइन गैलरीज
इन वेबसाइट्स पर  सिर्फ पेंटिंग्स ही नहीं खरीदी जा सकती, बल्कि आर्टवर्क को देखा भी जा सकता है। ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स आर्टिस्ट को आर्ट गैलरीज भी मुहैया करवा रही हैं, जिनमें अनसोल्ड पेंटिंग भी डिस्प्ले की जाती हैं। देश के विभिन्न कोनों से अपलोड की गई पेंटिंग्स आर्टिस्ट के साथ आर्ट लवर्स को भी लुभाने लगी हैं।
पेंटिंग्स फॉर ओकेजन
खास बात यह है कि कस्टमाइज वेबसाइट पर डिफरेंट तरह की पेंटिंग्स के सेग्मेंट बने हुए हैं, जिन पर कॉरपोरेट आर्ट से लेकर होटल आर्टवर्क, सभी शामिल हैं। दूसरी ओर, यदि आप किसी को स्पेशल ओकेजन पर पेंटिंग गिफ्ट करना चाहते हैं, तो ओकेजन के मुताबिक पेंटिंग मिल जाएगी। यहां तक की फ्रे मिंग और गिफ्ट रैपिंग की सुविधा भी मिल जाएगी।
गुड फॉर आर्ट लवर्स 
कस्टमाइज ऑनलाइन शॉपिंग के अलावा ये पेंटिंग्स नामी शॉपिंग वेबसाइट्स से भी खरीदी जा सकती हैं। यह सुविधा उन आर्ट लवर्स और आर्टिस्ट के लिए फायदेमंद हो सकती है, जहां आर्ट गैलरीज की कमी है।
खरीद सकते हैं ऑनलाइन
सिर्फ पेंटिंग्स ही नहीं, यदि आप फोटोग्राफ्स भी पसंद करते हैं, तो उन्हें भी ऑनलाइन खरीद सकते हैं। देश में ?से फोटोग्राफी ग्रुप हैं, जो इस तरह की सुविधा देते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन फोटो सेल की कई ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स भी हैं। इनमें डिफरेंट प्लेसेज, वाइल्डलाइफ, फैशन, रूरल मार्केट, कॉन्सेप्ट शूट और रिमोट एरिया साइट्स सहित कई तरह की फोटो शामिल होती हंै। फोटोज का रिजोलूशन भी काफी हाई रहता है। इन साइट्स के जरिए आप फोटोग्राफी के बारे में जानकारी भी जुटा सकते हैं।

गुरुवार, 15 मई 2014

Kiran soni Gupta के तबादले के बाद


मूमल नेटवर्क, जयपुर। राजस्थान के कला एवं संस्कृति विभाग की प्रमुख सचिव किरन सोनी गुप्ता के तबादले के बाद इस पद पर आने वाले नए अधिकारी के नामों के कयास लगने लगे हैं। सचिवालय के गलियारों में नए प्रमुख सचिव के लिए फिलहाल तीन नाम चल रहे हैं। देखना यह है कि इनमें से कौन चुना जाता है या सीएमओ से कोई नया चौकाने वाला नाम सामने आता है। उल्लेखनीय है कि किरन सोनी गुप्ता को केन्द्रीय कपड़ा मंत्रालय के आधीन मुंबई स्थित टेक्सटाइल कमिश्रर कार्यालय में कमिश्रर के पद पर लगाया गया है। 
सचिवालय के गलियारों में कला एवं संस्कृति विभाग के नए प्रमुख सचिव के लिए फिलहाल तीन नाम चल रहे हैं। इनमें मुख्य सचिव स्तर के वरिष्ठ अधिकारी उमराव सालोदिया का नाम प्रमुख है, लेकिन राज्य सरकार उन्हें पहले ही जवाहर कला केंद्र के महानिदेशक पद पर लगा कर पहले ही कोई संदेश दे चुकी है। इसके बाद वरिष्ठ आईएएस राजेस्वर सिंह का नाम आ रहा है, वे अभी पर्यटन विभाग में प्रमुख सचिव के पद पर हैं। इन्हीं के साथ पूर्व में भी कला एवं संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव पद पर कार्य कर चुकी गुरजोत कौर के नाम पर भी विचार किया जा सकता है। उल्लेखनीय है मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इस विभाग के काम को काफी गंभीरता से ले रहीं हैं। यही कारण है कि अब तक यह विभाग उनहोंने अपने ही पास रखा है।
काफी काम किया
भारतीय प्रशासनिक सेवा में राजस्थान कैडर की अधिकारी किरन सोनी वर्ष 1985 बैच की हैं। एक प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ ही वे पेंटिंग्स भी करती हैं। विभिन्न प्रशासनिक पदों पर व्यस्त रहते हुए भी उन्होंने अपने पेंटिंग्स के काम को बराबर बनाए रखा। इसी के साथ संबंधित क्षेत्रों में पेंटिंग के साथ कला से जुड़ी गतिविधियों को गति देती रही। इसके चलते कला जगत के उदयमान कलाकारों के एक बड़े  वर्ग का समर्थन उनके साथ बना रहा। कला संस्कृति विभाग की प्रमुख सचिव पद पर आने के बाद राजधानी जयपुर सहित प्रदेश के कई हिस्साों में इनके सहयोग से कला गतिविधियां और तेज हुई। खासकर जयपुर में लिट्रेचर फेस्टिवल की तर्ज पर डिग्गी हाउस में आर्ट फेस्टिवल का भी आगाज हुआ। आयोजन की सफलता या विफलता भले ही बहस या जांच का विषय हो सकती है, लेकिन एक बड़े  खर्चे वाले बड़े आयोजन के लिए जितना भी संभव था किया गया। ऐसा पहली बार हुआ जब ऐसे आयोजनों के लिए कला एवं संस्कृति विभाग की ओर से 6-6 अंको में सहायता राशि सुलभ कराई गई। ऐसे आयोजनों के प्रति उदासीन रहने वाली अकादमियों को भी आयोजन में हिस्सा लेने वाले कलाकारों को मानदेय का भुगतान करने के लिए आगे आना पड़ा। कई अन्य को भी सहयोगी या प्रायोजक के रूप में आगे आना पड़ा।
शुष्क क्षेत्र में भी हरियाली 
समय - समय पर ओने वाले अन्य आयोजनों मेें इनकी सक्रीय भूमिका भी उल्लेखनीय रही। वह भले ही फेस्को आर्ट के लिए किए शिविर हो या महिला चित्रकारों के लिए किया गया नेशनल केंप, वह चाहे मतदाताओं को जागरुक करने के लिए कलाकारों द्वारा किए गए प्रयास हों या राज्य मेें महानरेगा कार्यो की उपलब्धियों को अपनी पेंटिंग्स के जरिए अन्य राज्यों और विदेश तक पहुंचाने का पुनीत कार्य। एक प्रशासनिक अधिकारी के साथ एक कलाकार होने का धर्म इन्होंने बखूबी निभाया। यही कारण रहा कि वनस्थली विद्यापीठ की एक विद्यार्थी ने किरन सोनी गुप्ता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोध कार्य भी किया। यह बात अलग है कि यह शोधपत्र स्वीकृत नहीं हो रहा। कला एवं संस्कृति जैसे उपेक्षित व शुष्क क्षेत्र को हरियाली दिखाने का श्रेय इन्हीं को जाता है। कला जगत में किरन सोनी गुप्ता का यह कार्यकाल हमेशा याद किया जाता रहेगा।

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शुक्रवार, 2 मई 2014

युवा कलाकार या Premature Delivery.

 वरिष्ठों का अन्याय
मूमल नेटवर्क, जयपुर। अच्छी और बेहतर कलाकृतियों की प्रदर्शनी के संबंध में तो हमेशा ही लिखा जाता है और उनकी विशेषताओं को कला के जानकार भले ही मुखर होकर बोलने से कतराते हैं, लेकिन मन ही मन सराहते भी हैं। जब कि इस मामले में उदयीमान युवा कलाकारों के साथ बहुत अन्याय हो रहा है। उनके काम को यही जानकार बिना वजह मुखर होकर सराहते हैं और इसे प्रोत्साहन कहते हैं। जबकि अनेक युवा कलाकारों का काम अन्य कलाकारों की अधकचरी नकल भर होता है। ऐसे युवा कलाकारों के साथ इसे सीनियर्स द्वारा किया जाने वाला अन्याय कहा जाना चाहिए।
युवा कलाकार के काम 
प्री मेच्योर डिलीवरी सा
अपूर्ण साधना और अपरिपक्व कूंची के साथ प्री मेच्योर डिलीवरी सी आर्ट एग्जीबिशंस का सिलसिला पिछले कुछ अर्से से एकाएक बढऩे लगा है। पिछले दिनों जयपुर के जवाहर कला केंद्र की एक कला दीर्घा में एक और ऐसी प्रदर्शनी देखने को मिली जिसे देख मन विषाद से भर गया। इस युवा कलाकार की पहली प्रदर्शनी थी और इसमें कुल 22 काम प्रदर्शित किए गए थे। पूरी प्रदर्शनी पर किसी व्यवसायिक आयोजन की छाया थी। प्रदर्शनी की प्रचार सामग्री भी उसी के अनुरूप थी। कला दीर्घा को गुलाब और गैंदे के फूलों से सजाने के नाम पर एक कोने से दूसरे कोने तक फूलों से पाट दिया गया था। एक बड़ी सी गोल मेल पर बिसलरी की क्वाटर बोट्लस के साथ चॉकलेट व टाफी के साथ तरह-तरह के कुकीज सजाए गए थे। इन सब के साथ सजे बैठे युवा कलाकार के साथ मौजूद थे उसके अभिभावक। ...और इन सब के बीच बेतरतीब ठंग से लगाए गए युवा कलाकार के वह सभी काम जो उसने अपनी शिक्षा अवधि में अभ्यास के दौरान बनाए होंगे।
भौंडा प्रदर्शन व तामझाम
पता नहीं इस प्रदर्शनी के प्रस्तुति पक्ष पर किस जानकार सलाहकार की सेवाएं ली गई, लेकिन यह स्पस्ट दिख रहा था कि सलाहकार जी को दिखावे के तामझाम की जानकारी तो है, लेकिन कलाकृतियों की प्रस्तुति के बारे में वे कुछ नहीं जानते वरना कलाकृतियों के लिए चुने गए स्थान और उनकों दर्शक की आई लेवल पर रखने का जरूरी पक्ष नजरअंदाज नहीं होता। खैर! कलाकृति दर्शनीय हो तो कला प्रेमी उसे कुछ ऊंचा-नीचा होकर भी देख सकता है और वह किसी भी स्थान पर हो उसे देखता ही है। यहां हम चित्रकारी की बात करें तो अध्ययन काल के काम तो अपरिपक्व ही होंगे यह बात समझ में आती है, लेकिन यह समझ में नहीं आता कि उनका अदर्शनीय होने के बावजूद उनका सार्वजनिक प्रदर्शन प्रदर्शन क्यों? केवल कला दीर्घा की दीवार के खाली लग रहे स्थान को भरने भर के लिए कुछ भी लगा देना क्या कला प्रशंसकों का अपमान नहीं?
नकल और केवल नकल
कुछ बिरला प्रतिभाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश कला विद्यार्थियों के अध्ययन काल में बनाए चित्र किसी न किसी स्थापित या महान कलाकार की कृतियों से ही प्रभावित होते हैं। जाहिर है, इस युवा कलाकार के काम में भी वही सब था। अब अन्य चित्रों की बात करें तो वह भी नकल, बल्कि कहा जा सकता है लगभग हूबहू नकल। ...और नकल भी किसकी किसी बड़े, महान या स्थापित कलाकार के काम की नहीं, बल्कि पूरी तरह कॉमर्शियल उन पोस्टर कलाकारों की जिनके काम कम्प्यूटर्स के वॉलपेपर के लिए उपयोग किए जाते हैं। यह वाल पेपर्स भी वे जो गूगल इमेज पर 'कलरफुल पेंटिंग्स' टाइप करते ही धड़ाधड़ मॉनीटर पर प्रकट हो जाते हैं।
गूगल इमेज पर 'कलरफुल पेंटिंग्स' -1

गूगल इमेज पर 'कलरफुल पेंटिंग्स' -2

गूगल इमेज पर 'कलरफुल पेंटिंग्स' -3
प्रोत्साहन या पतन
इस पर तुर्रा यह कि इस काम की कलाकार के आसपास मंडराने वाले सभी लोग तारीफ करते करते नहीं थकते। चलो अभिभावक के लिए तो उनकी संतान ही सबसे होनहार हो सकती है, परिजन और अभिभावकों के सोशल सर्कल में शामिल लोग भी किसी न किसी मजबूरी या कला क्षेत्र की कम जानकारी के चलते ऐसा करते हैं, दैनिक समाचार पत्रों के पुलआउट और लोकल टीवी चैनल्स के व्यस्त रिपोटर्स को भी दोष नहीं दिया जाना चाहिए, क्यों की इनमें से अधिकांश का विषय कला नहीं होता और युवा कलाकार का उत्थान या विकास इनका विषय या लक्ष्य भी नहीं होता। इन्हें तो बस हर खबर में रंग जमाना होता है, माना कि इनकी भी कई मजबूरियां हैं, लेकिन उन कला जानकारों का क्या जो सब जानते हुए भी युवा कलाकार की मिथ्या सराहना करते हैं। एक और वे कहते हैं युवाओं को कड़ी साधना और अथक अभ्यास करना चाहिए। मौलिकता पर भी यही जानकार कला गोष्ठियों के व्याख्यान में सार्वजनिक रूप से ज्ञान वितरित करते हैं, जबकि युवा कलाकार और उसके परिजनों के मुंह पर उसके अधकचरे काम की सराहना करते हैं और इसे प्रोत्साहन देने और हतोत्साहित नहीं करने की मंशा के लबादे से ढक देते हैं।
इतने क्रूर और कठोर क्यों ?
मिथ्या सराहना करने वाले कला के सहृदय जानकार और वरिष्ठ कलाकार उदयीमान युवा कलाकारों के प्रति इतने कू्रर और कठोर क्यों हो जाते हैं? किसी युवा कलाकार की भू्रण हत्या होते देखकर भी उन्हें रहम क्यों नहीं आता? कोई तो हो जो नवांकुरों की जड़ों में तेजाब डालने से साफ इंकार करे, कोई तो हो जो इन नई पौध पर मट्ढा डालने का विरोध करे....। -गायत्री 

मूमल मीमांसा 
अधबुने सपने और कला मृत्यु के पथ 
यह सही है कि जयपुर में कला गतिविधियां बढ़ी हैं। जवाहर कला केन्द्र की दीर्घाएं कला प्रदर्शन से आबाद रहने लगी हैं। अलग-अलग जगहों से आए आर्टिस्ट्स के साथ शहर के कलाकारों के फन से भी रूबरू होने के अवसर बढ़े हैं। कला के विभिन्न रूपाकारों के बीच घूमते हुए कई बार कुछ ऐसे प्रदर्शन भी देखने को मिलते हैं, जिनके माने ही समझ में नहीं आते।
साधना रहित खींंची हुई रेखाएं या फिर किसी स्थापित कलाकार की कृतियों की नकल या फिर दोनों का संगम। यह सब देखकर कला के प्रति आसक्त मन उदास हो जाता है, रोष से भर जाता है। ऊपर से कोढ़ पर खाज का काम करता है, अपरिपक्व पत्रकारों द्वारा ऐसी कला पर शब्दों के लम्बे-चौड़े मकड़-जाल से किया गया महिमा मंडन। किसी अखबार में छपना, वाहवाही हासिल करना और अपनी अपूर्णता को पूर्ण मानकर गर्व करना। ऐसी वृति को पालने वाले कलाकारों की संख्या में बीते दिनों अच्छी-खासी वृद्धि हुई है।
शौकिया कक्षाओं में कुछ समय तक अधकचरा ज्ञान प्राप्त करने वाले लोग या फिर कला में अध्ययनरत छात्र समय से पूर्व ही अपनी कला का प्रर्दशन करने का लोभ नहीं संवार पाते। रातो रात प्रसिद्धि का आकाश छूने का सपना पाल जरूरी कला साधना से पहले ही दीर्घाओं की दीवारों पर अपने अधबुने सपने को टांग कला मृत्यु के पथ पर चल देते हैं। अफसोस की झूठी वाहवाही के चलते समय रहते उन्हें वास्तविक्ता का भान भी नहीं हो पाता है।
पहले अपरिपक्व प्रदर्शन और फिर हवाई प्रकाशन, समय से पहले की परवाज चाहने वाले उनके सपनों को हवा देने लगते हैं। और उनके आगे बढऩे की अपार क्षमताओं की संभावनाएं इस लालसा के आगे टूट जाती हैं, क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। झूठी प्रशंसा से खिंची भ्रम की दीवार उस पार के सच को देखने नहीं देती। कुछ समय बाद जब भ्रम की दीवार टूटती है, तब तक हौसले पस्त हो चुके होते हैं। दिलोदिमाग कुण्ठा से भर चुका होता है। और सामने होती है, गहरी टूटन लिए अधूरी साधना।

मंगलवार, 11 मार्च 2014

इटली की डेनिएला का भारत को शुक्रिया


जयपुर के जेकेके में 12 से चित्र प्रदर्शनी

मूमल नेटवर्क,जयपुर। इटली के मिलान शहर की कलाकार डेनिएला कट्टानेओ की भारत भ्रमण के दौरान बनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी 12 मार्च की शाम जयपुर के जवाहर कला केंद्र में शुरू होगी।
इटली से निकलकर दुनियां के विभिन्न हिस्सों से होकर भारत आने के बाद डेनिएला की विचलित कला को जिस ठहराव का अहसास हुआ वह इनके काम में स्पस्ट नजर आ रहा है। खासकर राजस्थान के राज महलों से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों तक का जनजीवन उन्होंने कागज पर जलरंगों से उकेरा और फिर मरुभूमि की ठेठ ग्रामीण कसीदाकारी से जोड़कर अपने भाव व्यक्त कर दिए। डेनिएला की सभी कृतियों में कमोबेश महिलाओं और बच्चों के प्रति उनका अनुराग झलकता है। वे कहती हैं कि बात चाहे इटली की हो या भारत की कुल मिलाकर सोच एक ही है। इसके लिए वे ककविगुरू रवीन्द्रनाथ टैगौर की उस बांग्ला कविता की पंक्तियों को आत्मसात किए हुए हैं जिनका भावार्थ है कि 'भले ही हमारे बीच एक नदी बह रही है, लेकिन इसके दोनों किनारों पर गूंज रहे गीत समान हैं।'
हालांकि डेनिएला ने अपने आर्ट शो को 'एनकांउटर्स' ए ट्रिब्यूट टू इंडिया नाम दिया है, लेकिन यहां एनकाउंटर का अर्थ 'मुठभेड़' न होकर इसका बहुत ही कोमल आशय है...सामना या साक्षात्कार। डेनिएला ने इस साक्षात्कार के लिए भारत को अपनी कूंची से 'शुक्रिया' कहने का भरपूर प्रयास किया है। वैसे भी डेनिएला को हिन्दी के केवल दो ही शब्द आते हैं, शुक्रिया और नमस्ते।
डेनिएला की कलाकृतियों की प्रदर्शनी का उद्धाटन शाम 6 बजे जवाहर कला केंद्र के महानिदेशक उमराव सालोदिया करेंगे। यह प्रदर्शनी 15 मार्च तक देखी जा सकती है।

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

शेखावाटी हवेलियों के चित्रों पर कंपनी शैली का प्रभाव


शेखावाटी हवेलियों के चित्रों पर ढूँढारी व कम्पनी चित्रकला का प्रभाव
यह लेख लेखिका डॉ. कनुप्रिया कुमावत के शोधपत्र कुमावत कलाकारों का योगदान व चेजारा चितेरों द्वारा शेखावाटी के हवेलियों के चित्र व चित्राकनों पर अंग्रेजों का प्रभाव से लिए गए कुछ अंश है। लेखिका ने यह शोधपत्र राजस्थान स्कूल आफ आर्ट की तरफ से कनोडिया कॉलेज में 
31 जनवरी से 3 फरवरी तक हुए सेमीनार में पढ़ा था।

 ढूँढारी चित्रकला का अनुकरण ठिकानों में भी हुआ है। ईसरदा, सिवाड़, झिलाय, चौमू, मालपुरा, सामोद में भी कलाकारों ने भित्ति चित्रण किये। इनका प्रभाव हमको शेखावाटी क्षेत्र के हवेलियों में भी स्पष्ट नजर आता है। यूं तो शेखावाटी अपने को जयपुर से स्वतंत्र मानकर चलता था, पर चित्राकन के विषय में वह जयपुर से बेहद प्रभावित नजर आता है। 1947 तक शेखावाटी जयपुर की रियासत का एक हिस्सा था । शेखावाटी में अधिकतर हवेलियों का निर्माण 19 वीं शताब्दी के मध्य ओर उत्तराद्र्ध में किया गया था।
शेखावाटी के चेजारा कुमावतों ने हवेलियों के निर्माण व चित्रकारी के काम की छाप ऐसी छोड़ी, जो आज भी देखने लायक है । शेखावाटी के अधिकांश भित्ति चित्र लगभग 125 से 150 वर्ष पूर्व के बने हैं। हवेलियों में अराइस की आलागीला पद्धती और दीवार की सूखी सतह पर भी चित्राकंन मिलते है। अराइस क ी गीली सतह के चित्रो में स्केच (कुराइ) तकनीक का सुन्दर प्रयोग किया है। अन्दर का हिस्सा आज भी सुरक्षित व सजीव है।
चित्रो के विषय में - रामायण , महाभारत, कृष्ण लीला, शिवपार्वती, ढोलामारू को लिया गया है। रगों में नीला (देशी नील), हरा (हरा पत्थर , सीलू), लाल (गेरू व सिंगरफ) जैसी प्राकृतिकरगों का प्रयोग किया गया है।   इन चित्रों का निर्माण 19 वीं शताब्दी के मध्य या उत्तराद्र्ध में होने के कारण इन पर यूरोपीय प्रभाव भी अधिक रहा है। शेखावाटी के सेठ कलकत्ता में रहकर यूरोपीय जीवन से भली भांती परिचित हो गये थे। इन्होने यहां अपनी हवेलियां बनाई और उन्हें चित्रों से सुसज्जित किया। जैसे लक्ष्मणगढ में झुन्झुनू वालों की हवेली, मुकुन्दगढ में नागलियो की हवेली, झुन्झुनू में टीबड़े वालों की हवेली, ईसरदास मोदी की हवेली, चूड़ी अजीतगढ में नेमाणियों की हवेली, चुरू में कोठारीयों की हवेली इसके अतिरिक्त - सीकर, नवलगढ, मण्डावा, फ तेहपुर, रामगढ, लक्षमणगढ, रानोली, वैध की ढाणी, सीकर, खाटूश्याम जी में भी कई हवेलियां है।
 शेखावाटी क्षेत्र में हमें धार्मिक चित्र, सामंती, श्रगांरिक चित्र, लोकजीवन पर चित्र और कंपनी शैली के समिश्रित चित्र देखने क ो मिलते हैं । सीकर मे मिले धार्मिक चित्रों में रामकृष्ण लिलाऐं, रामगढ की हवेली मे ब्रम्हा जी का चित्र जिसमे दाढी मूंछे हैं। सेठों की हवेली मे लोकजीवन, दरबारी चिंत्राकन , गांवों व कस्बो का चित्र, ऊॅ ट, हाथी, घोड़े, भाले, तीर-तलवार व शस्त्र तो कहीं झूला झूलती स्त्रीयां भी हैं।
इन हवेलियों में अंग्रेजों के प्रभाव का गहराई से अवलोकन करें तो सीकर के ठिकानेदार माधवसिंह ने 20 जून 1897 विक्टोरिया जुबली हॉल बनवाया। यहां के अभिलेख कहतें है कि विक्टोरिया के शासन के 60 साल पूरे होने के उपलक्ष्य मे यह हॉल बनवाया गया था। सेठ साहूकारों ने उदारतापूर्वक कलाकारों व चित्रकारों को आश्रय देकर कला को जीवित रखने व विकसित करने में अपना योगदान दिया।
शेखावाटी क्षेत्र में अधिकंाशत ढूँढारी और कंपनी दोनो ही शैली का चित्रण हुआ है।
यहां रेल का प्रचलन पहली  बार 1916 में हुआ। लेकिन 1865 व 1899 में बने दो भित्ति चित्रों में रेल का चिंत्राकन किया गया हैं। 1865में रामगढ में रामगोपाल पोदर की हवेली में काले रगं का ईंजन व लाल रंग के डब्बों को चित्रित किया गया। ड्राइवर व खलासी अंग्रेजी वेशभूषा मे हैं । सर पर टोप पहने हैं। पहिए बड़े आकार के, मुसाफि र अलग-अलग वेशभूषा में दिखलाए गयें है।

नीम का थाना में शिव नारायण प्रसाद पटवारी की हवेली में रेलगाड़ी का चित्र 1899 का हैं। रामगढ की पोद्दार की हवेली में इग्लण्ै ड की महारानी मैरी और जॉर्ज पचंम के आगमन के चित्र हंै। चार पहियों वाली व दो पहियों की गाडी़ के चित्र, 1890 में लक्षमणगढ के बद्रीदास वैद्य की हवेली के भित्ति चित्रो में अग्रेजी वेशभूषा पहने साईकिल सवार, 1890 में मंडावा में हवाई जहाज का चित्र, 1900 में नागरमल सेठ की नेमानी की हवेली मे कार के चित्र मिलते हैं।
 शेखावाटी के चितेरे
भित्ति चित्रण की इस समृद्धशाली परम्परा मे चित्रकारों का नाम और समाज में एक स्थान था। वे कोई गुमनाम चितेरे नहीं थे। इनमे नवलगढ के चितेरे- स्व. प्रताप जी बेडवाल, स्व.लादूराम जी बबेरवाल, स्व.मांगीलाल जी घोड़ेला। मण्डावा के चितेरे स्व.मुरलीधर जी तोंदवाल, स्व.हनुमान जी सिरसवा, फ तेहपुर व रामगढ के चितेरे स्व.राधेश्याम तूनवाल, स्व.आशाराम जी तूनवाल थे। इसके साथ रामलाल कुमावत, मूलचन्द कुमावत, गजानन्द तूनवाल इत्यादि चित्रकारों के नाम भी शामिल हैं। यह सही है कि राज्याश्रय मे रहते हुऐ इन चित्रकारों का लिखित में कहीं उल्लेख नहीं है फिर भी विभिन्न साक्ष्यों से उनके नाम प्राप्त हो जाते हैं।
                                            -डॉ. कनुप्रिया कुमावत
अब अपनों से अपनी बात 
पाठक ही बताएं..
पिछले दिनों कला विद्यार्थी पाठकों की यह मांग जाहिर हुई है कि 'मूमल' में ताजा समाचारों और कला जगत की गतिविधियों के साथ शैक्षिक पक्ष को भी बढ़ाया जाए। इसके लिए प्रत्येक अंक में किसी न किसी नए या पुराने कलाकार के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाए।
इसके बाद मूमल के संपादक मंडल ने तय किया है कि वर्तमान में उपलब्ध लिमिटेड प्रिंट एरिया में उतने विस्तार से जानकारी संभव नहीं है जितनी विद्यार्थी चाह रहे हैं। इसके लिए कुछ विशेष संस्करण प्रकाशित करने होंगे। इसके बाद उन कलाकारों का चयन भी आसान नहीं जिनके बारे में आप जानकारी चाहते हैं।
ऐसे में अब आप ही बताएं कि आप नए या पुराने किन-किन कलाकारों और कला विधाओं के बारे में जानना चाहते हैं? आप की राय व आवश्यता जानने के बाद ही मूमल संबंधित विषय विशेषज्ञों से सामग्री तैयार कराके आगामी अंकों में इसे प्रकाशित करेगी।
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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

Asian Art Show एशियन आर्ट शो


एशियन आर्ट शो में जयपुर के 
विद्यासागर उपाध्याय एवं विनय शर्मा 
के चित्र प्रदर्शित

दिल्ली के आईफैक्स कला दीर्घाओं में आरम्भ हुए एशियन
आर्ट शो में जयपुर के वरिष्ठ चित्रकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय एवं
विनय शर्मा की कृतियाँ दर्शको को आकर्षित कर रही है । दिनांक 17
फरवरी को कोरियन कल्चर सेन्टर, नई दिल्ली के निदेशक किम कुंम
प्योंग ने प्रदर्शनी का उद्घाटन किया ।

कोरिया की प्रसिद्ध कला पत्रिका “मैगजीन आर्ट “ द्वारा कोरियन कल्चर
सेन्टर के सहयोग से आयोजित इस प्रदर्शनी में कोरिया, भारत, चीन एवं
बंगला देश के कलाकार भाग ले रहे है । 100 कलाकारों के चित्रों
की प्रदर्शनी में भारत के 14 कलाकार, कोरिया के 80, बंगलादेश के
4 एवं चीन के दो कलाकारों को आंमत्रित किया गया है । यह प्रदर्शनी
दिसम्बर में साऊथ कोरिया के डे जोन शहर में होने वाले
इन्टरनेशनल आर्ट फेयर में लगाई जायेगी ।

डॉ. विद्यासागर उपाध्याय के एक्रेलिक माध्यम से बने कैनवास पर रंगांे
की सिम्फनी को रोचक तरीके से दर्शाया है । रंगों की फ्रीडम का
अहसास उनके चित्रों में देखने को मिलती है । प्रफुल्लित रंग मानो
कैनवस पर कोई राग सुना रहे हों ।
वहीं विनय शर्मा अपनी चिर परिचित शैली में भाषा की दरखत
कैनवास पर उतार समृद्ध भारतीय साहित्य की बानगी कैनवास पर दर्शाई है ।
पुराने हस्तलिखित खतों को कैनवस पर हल्के गहरे रंगांे से उकेर गुजरे
समय की स्मृतिों को दर्शाया है ।
विनय शर्मा के चित्र कोरिया में प्रदर्शित
दिनांक 18 फरवरी से 27 फरवरी तक इण्डियन कल्चर सेन्टर सियोल -
साऊथ कोरिया में जयपुर के विनय शर्मा के चित्र प्रदर्शित किये जा रहे है ।
इस प्रदर्शनी में कुल बीस कलाकारों की कृतियाँ दिखाई जा रही है
इनमें 9 भारतीय एवं 11 कोरियन कलाकार है ।

कोरिया इण्डिया कन्टम्परेरी आर्टिस्ट एसोसियेशन के सहयोग से आयोजित इस प्रदर्शनी मंे विनय शर्मा ने विशेष रूप से तैयार किये हैण्डमेड पेपर पर पुराने हस्तलिखित हैण्डमेड को पारदर्शिता से दिखाया है । विनय अपने पेपर का निर्णय स्वयं करते है एवं परत-दर-परत उसमंे पारदर्शिता दिखाते हैं । एैसा प्रतीत होता है मानो अक्षर झरोखों से देख रहे हो । पुरानी भारतीय जीवन पद्धति के साक्षी बनते विनय शर्मा के चित्र दर्शकों को अपनी और आकर्षित करते है । ऐसा प्रतीत होता है मानो गुजरे समय को वे अपने चित्रों में समेटना चाहते हों ।